पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२७४

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.me.me...AJ.MPARANTERSonianuman-- २३८ सिद्धान्त और अध्ययन ___'श्रात्मा की अपनी स्वतन्त्र किया है कल्पना, जो रूप का सूचम साँचा खड़ा करती है और उस साँचे में स्थूल द्रव्य को ढालकर अपनी कृति को गोचर या व्यक्त करती है । वह 'साँचा', अात्मा की कृति या प्राध्यामिक वस्तु होने के कारण, परमार्थतः एकरस और स्थिर होता है । उसकी अभिव्यन्जना में जो नानात्व दिखाई पड़ता है वह स्थूल दिव्य' के कारण है जो परिवर्तनशील होता है । कला के क्षेत्र में यही साँचा (Foran) सब- कुछ है, द्रव्य या सामग्री ( Matter ) ध्यान देने की वस्तु नहीं (An nesthetic fact is form and nothing.)१ .. --चिन्तामणि : भाग २ (काव्य में अभिव्यन्जनाबाद, पृष्ठ १७२) 'स्वयंप्रकाशज्ञान ( Intuition ) का 'साँचे में ढलकर व्यक्त होना ही कल्पना है, और कल्पना ही मूल अभिव्यञ्जना (LExpression ) है जो भीतर होती है और शब्द, रंग श्रादि द्वारा बाहर प्रकाशित की जाती है। यदि सचमुच स्वयंप्रकाशज्ञान हुअा है, भीतर अभिव्यञ्जना हुई है, तो वह बाहर भी प्रकाशित हो सकती है। लोगों का यह कहना कि कधि के हृदय में बहुत-सी भावनाएं उठती हैं, जिन्हें वह अच्छी तरह व्यक्त नहीं कर सकता, कोचे नहीं मानता । वह कहता है कि जो भावना या कल्पना बाहर व्यक्त नहीं हो सकती उसे अच्छी तरह उठी हुई ही न समझना चाहिए।' चिन्तामणि : भाग २ (काव्य में अभिव्यसनाबाब, पृष्ठ १७२) कोचे और सौन्दर्य के सम्बन्ध में प्राचार्य शुक्लजी क्रोचे का मत सौन्दर्य-बोध निम्नोल्लिखित शब्दों में देते है :---- 'सौन्दर्य से उसका तात्पर्य केवल अभिव्यञ्जना के सौन्दर्य से, उक्ति के सौन्दर्य से है किसी प्रस्तुत वस्तु के सौन्दर्य से नहीं । किसी वास्तविक या प्रस्तुत वस्तु में सौन्दर्य कहाँ ? क्रोचे तो कल्पना की सहायता के बिना प्रकृति में कहीं कोई सौन्दर्य नहीं मानते । जो कुछ सौन्दर्य होता है वह केवल अभिव्यञ्जना में, उक्ति-स्वरूप में । यदि सुन्दर कही जा सकती है तो उक्ति ही, असुन्दर कही जा सकती है तो उक्ति ही। इस मौके पर अपने पुराने कवि केशवदासजी याद आ गये, जो कह गये हैं कि-'देरले मुख भावे, 1. Croce (Aesthetic-Inuition and Art, Page 26). मूल पुस्तक में यह उन्हरण इस प्रकार है :---- 'The aesthetic fact, therefore, is form uncl nothing but forrn'