पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/२७६

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AmATION URLIRasaara a mana LamAnam---- २४० सिद्धान्त और अध्ययन ने वस्तु को गौण रखकर कल्पना को अधिक महत्त्व दिया है किन्तु कल्पना नितान्त निराधार नहीं होती। बस्तु होती अवश्य है किन्तु बिना कल्पना और स्मृति तथा स्वयंप्रकाशज्ञान के उसकी रूप-रेखा निश्चित नहीं होती है किन्तु यदि वस्तु न हो तो स्मृति और कल्पना खोखली रह जायें । हम यहाँ वस्तु और आकार के प्रश्न पर पाजाते हैं। ___ अभिव्यञ्जनावाद में प्राकार. ( Form) की प्रधानता तो है ही किन्तु उसमें वस्तु या सामग्री (Matter) का नितान्त तिरस्कार नहीं है । यह तो ऊपर बतलाया ही गया है कि हमारे स्वयंप्रकाशनज्ञान में श्राकार और वस्तु विविधता वस्तु के कारण ही आती हैं । स्वयं शुक्लजी ने इसका उल्लेख किया है-उसकी अभिव्यन्जना में जो नानात्व दिखाई पड़ता है वह स्थूल 'तुव्य' (वस्तु) के कारण है जो परिवर्तनशील होता है । और देखिये :--- 'Without matter, however, our spiritual auctivitiy would not leave its abstraction to become concreate and real, this or that Spiritual content, this or that cle:finite intuition.' --(roce (Asthethetic~~ntuition in Rapression, paaye ? : 10) द्रव्य या वस्तु के बिना हमारी आध्यात्मिक निया खोखली रह जायगी । उसके बिना वह वास्तविक और मूर्त रूप न धारण कर राकेगी । वस्तु से ही . हमारे मन पर छापें (Intuitions) पड़ती हैं और उन्हीं के आधार पर स्वयं- प्रकाशज्ञान (Impressions) बनते हैं। मेरी समझ में वास्तव बात यह है कि वस्तु और आकार का पार्थक्य नहीं हो सकता। वस्तु का महत्व भी आकार पाकर ही निखरता है, बिना वस्तु के कोरे आकार का कोई मूल्य नहीं । स्वयं क्रोचे ने खोखले चमत्कारपूर्ण वाक्यों को निरर्थक कहा है :-...... _ 'He who has nothing definite to express my try to hide his internal emptiness witli n flood of worls,... although, at bottom, they convey nothings.' . -Croce (Aesthetic-Nature and Art, pusye 160) ___ इससे बढ़ कर कोरी अभिव्यञ्जना का और क्या जोरदार खण्डन हो सकता है ? कोचे कोरी अभिव्यञ्जना के प्रचारक नहीं कहे जा सकते । बस्तु अवश्य चाहिए, उसके गुण गौण हैं किन्तु अभिव्यक्ति की जाति में उनका महत्व है।