पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/३०५

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समालोचना के मान-कलावाद की व्याख्या और अन्य मत २६॥ म क्या लिया और स्वयं उसने समाज को क्या दिया। कोई-कोई कवि अपने समय से आगे भी होते हैं और वे लोग ही इतिहास बनाते हैं । साहित्य के इतिहास में देश के राजनीतिक इतिहास और जाति के मानसिक विकास की झलक रहती है। वीरगाथाकाल का साहित्य उस समय की परिस्थितियों काः ही फल था। कबीर, जायसी आदि में हिन्दू-मुसलिम-संघर्ष और उनके शमन के उदगारों की झलक है। सर, तुलसी में मसलिम तथा नाथपंथ द्वारा ग्राई हुई बौद्ध विचारधाराओं से पृथक् हिन्दू विचारधारा का निजत्व बनाये रखने की प्रवृत्ति है । रीतिकालीन कवियों में तत्कालीन विलास-भावना और भक्ति- काल के धार्मिक प्रभाव की झलक है। भूषरण में महाराष्ट्र-जाग्रति की प्रतिध्वनि है। इन पालोचनाओं के साथ कवि के जीवन के सम्बन्ध में ऐतिहासिक खोज भी आलोचना का अङ्ग है । वह वास्तव में ध्येय नहीं है. साधनरूप है । यह खोज मनोवैज्ञानिक पालोचना में सामग्रीरूप में सहायक होती है। जब हम किसी कवि के पारिवारिक जीवन के बारे में कुछ बातें जान लेते हैं, तो उसकी मनोवृत्ति पर भी प्रकाश पड़ जाता है। कबीर में जुलाहेपन की सगर्व चेतना थी। जायसी में अपनी कुरूपता की हीनताग्रन्थि थी। तुलसीदासजी में भी रत्नावली को 'लाज न श्रावत सापको' वाली बात को प्रतिक्रिया देखी जा सकती है। कविवर सत्यनारायण के 'भयो क्यों अनचाहत को संग' अथवा 'अब नहि जाति सही' आदि पद उनके व्यक्तिगत पारिवारिक जीवन की कठिनाइयों के आलोक में अच्छी तरह समझे जा सकते हैं। अाजकल पालोचना में भी मनोविश्लेषण-शास्त्र ( Phychoanalysis ) का पुट आने लगा है और कवि की कुण्ठामों आदि का ( जैसे नगेन्द्रजी की आलोचनात्रों में है ) उल्लेख होता है। तुलनात्मक आलोचना भी कई रूप से चल रही है । तुलनात्मक ग्रालोचना के सम्बन्ध में यह ध्यान रखना चाहिए कि तुलना में विषमता के साथ समानता भी आवश्यक है। वास्तव में तुलना समान वस्तुओं की ही हो सकती है। तुलना एक विषय के वा एक काल के कवियों की अथवा एक ही कवि की कृतियों की की जा सकती है। इसके अतिरिक्त एक ही विषय के विभिन्न देशों के कवियों को भी तुलना का विषय बनाया जा सकता है । तुलनात्मक आलोचना के सम्बन्ध में ध्यान रखने की सबसे बड़ी बात यह है कि मालोचक को किसी एक कवि की वकालत करना चाहिए। उसे अपनी . धर्मतुला में किसी पोर अपने व्यक्तित्व का बोझ न डालना चाहिए । इस .