पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/३०८

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२७२ सिद्धान्त और अध्ययन उसका कहना है कि पुराने पालोचक साहित्य का शुद्ध रूप बनाये रखने की चिन्ता रखते थे । आजकल की आलोचना में तो साहित्य कहीं इतिहास का रूप धारण कर लेता है तो कहीं मनोविज्ञान का और कहीं-कहीं नृ-विज्ञान (Ethnology ) और भूगोल शास्त्र का । स्पिन्नान (J. E. Spingern) ने भी इस प्रकार की प्रालोचनाओं का खूब खाका खींचा है किन्तु साहित्य वास्तव में सहित का ही भाव है। आजकल ज्ञान का विशेषीकरण होते हुए भी उसका अन्य शास्त्रों से विच्छेद नहीं किया जाता है । हमारे यहाँ कवि- शिक्षा में तो कवि के लिए सभी शास्त्रों का ज्ञान आवश्यक बतलाया गया है। विभिन्न शास्त्रों को काव्य की योनियाँ (स्रोत ) माना गया है, ऐसी सोलह योनियाँ बतलाई गई हैं ( देखिए डा० गङ्गानाथ झा की 'काव्य मीमांसा' पृष्ठ ४०-४७ ) फिर अालोचना में सब शास्त्रों का प्रयोग कोई पाश्चर्य की बात नहीं । अन्तर केवल इतना ही है कि अालोचना और काव्य-रचना में इन सब शास्त्रों का ज्ञान उन शास्त्रों के लिए नहीं होता वरन् उनको मानवी सम्बन्ध को विशेषता देकर होता है । मात्र अन्त में मूल्य सम्बन्धी अालोचना पर थोड़ा विवेचन कर लेना आवश्यक है । कवि क्या कहना चाहता था, उसने उसका कसा निर्वाह गिया ? इसके साथ यह प्रश्न भी प्रावश्यक हो जाता है कि जो मूल्म-सम्बन्धी कुछ उसने कहा वह समाज के लिए कहाँ तक मूल्यवान् मालोचना है। इस सम्बन्ध में कालावादी लोग जैसे, वाल्टर पेटर (Walter Puter ), प्रॉस्वार वाइल्ड (Oscar Wilde ), डाक्टर ब्रेडले ( Dr. Bradley ) मूल्यों की उपेक्षा करते हैं। इनके कहने का सार-भाग यह है कि जीवन का उद्देश्य क्रिया नहीं विचार है- प्राचार का मूल आधार एक साम्यमयी मनोवृत्ति में है। काध्य द्वारा वही मनोवृत्ति उत्पन्न होती है जो प्राचार-शास्त्र के मूल्य में है :--- 'That the end of life is not uction but contempla- tion-being as distinct from doing certain disposition of the mind is in some shupe or other the principle of higher morality. In poetry, in aurt you touch this principle.' --Quoted by shipley in "The Quest for Lircrature'. (Page 173)

... एक और लेखक ( William Griffith ) ने कहा है कि साहित्य का