पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/४०

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सिद्धान्त और अध्ययन इस आत्मा-सम्बन्धी प्रश्न के उत्तर पर काव्य का स्वरूप और उसकी परिभाषा निर्भर है और काव्य की आलोचना भी इसरो बहुत अंशों में प्रभावित होती है क्योंकि आलोचना के मान भी गाव्य के आदर्श विभिन्न सम्प्रदाय पर ही निर्भर रहते हैं। इस सम्बन्ध में प्राय: पाँच सम्प्रदायों का उल्लेख होता है । काव्य के विभिन्न अङ्गों में से किसी एक पर बल देने और महत्त्व प्रदान करने के आधार पर ही ये सम्प्रदाय अस्तित्व में आये हैं किन्तु इसका यह अभिप्राय नहीं कि कोई भी सम्प्रदाय काव्य के इतर अङ्गों की नितान्त उपेक्षा करता है। इन सम्प्रदायों और इनके प्रवर्तक तथा पोषक प्राचार्यों के नाम इस प्रकार है :---- सम्प्रदाय आचार्य १. अलङ्कार-सम्प्रदाय दण्डी, भागह, उद्भट आदि । २. वक्रोक्ति-सम्प्रदाय कुन्तल वा कुन्तक । ३. रीति-सम्प्रदाय वामन । ४. ध्वनि-सम्प्रदाय ध्वनि कार और प्रानन्दवर्धन । ५. रस-सम्प्रदाय भरत गुनि, विश्वनाथ । - अब इन सम्प्रदायों का पृथक्-पृथक् वर्णन किया जायगा । यह विवेचन रस को ही काव्य को प्रात्मा मानकर चलेगा और इसके ही आलोक में इनका मूल्याङ्कन किया जायगा। १. अलङ्कार-सम्प्रदाय : अलङ्कार शोभा को अल अर्थात् पूर्ण वा पर्याप्त करने के कारण अलङ्कार कहलाते हैं। अलङ्करण की प्रवृत्ति मनुष्य में स्वाभाविक है। इसके द्वारा उसके आत्मभाव और गौरव की वृद्धि होती है । यद्यपि अलङ्कार बाहरी साधन होते हैं तथापि उनके पीछे अलतिकार की आत्मा का उत्साह और अोज छिपा रहता है। बाहरी होने के कारण अलङ्कारों पर ही पहले दृष्टि जाती है, इसीलिए अलङ्कार-शास्त्र के इतिहास के प्रारम्भिक काल में अलङ्कारों का कुछ अधिक महत्त्व रहा है । इरा शास्त्र का अलङ्कार-शास्त्र के नाम से अभिहित होना ही अलङ्कारों की महत्ता का द्योतक है । कुछ प्राचार्यों ने इनको काव्य के लिए अनिवार्य माना है । दण्डी (छठी शताब्दी) ने अलङ्कारों को शोभा का कारण बताया है :- _ 'काव्यशोभाकरान्धर्मानलकारान्प्रचक्षते ।' ..काव्यावर्श (२११) चन्द्रालोककार जयदेवपीयूषवर्ष ( १३ वीं शताब्दी ) ने तो यहाँ तक माह .डाला कि यदि कोई काव्य को अलङ्कार-रहित मानता है तो अपने को।