पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/४६

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सिद्धान्त और अध्ययन कहेगा । कमल को कमल कहकर उसको सन्तोष न होगा वरन् वह ऐसी कल्पना करेगा कि जल मानो सहस्र नेत्र होकर प्राकाश को शोभा को देख रहा है। कथा-प्रसङ्ग आदि को कल्पना द्वारा बदल कर गनोरम बना लेने को भी पता के अन्तर्गत माना है। इसको उन्होंने प्रकरण-वक्रता कहा है। महाभारत की शकुन्तला की कथा को कालिदास ने बदल दिया है, यह प्रकरण-बसता का अच्छा उदाहरण है। अलङ्कार वाक्य-वक्रता में आते हैं। ध्वनि को भी पर्याय और उपचार-वक्रता के भीतर लाया गया है । इरा सम्बन्ध में रुय्यक का कथन है-'उपचार वक्रतादिभः समस्तो ध्वनिप्रपञ्चः स्वीकृत एवं'। आवार्य शुक्लजी ने वाल्मीकीय रामायण से वक्रोक्ति का जो उदाहरण दिया है ('न संकुचितः पन्था येन बाली हतो गतः' अर्थात् वह रास्ता संकुचित नहीं है जिससे बालि गया है अर्थात् सुग्नीव भी मृत्युपथ पर जा सकता है), यह उक्ति का वैचित्र्य है। यह वक्रता अवश्य है किन्तु इरो केवल-मात्र उदाहरण न समझना चाहिए। वक्रता अनेकों प्रकार की होती है। कुन्तल द्वारा दी हुई काव्य की परिभाषा इस प्रकार है :-- 'शब्दार्थों सहितौ चक्रकविव्यापारशालिनि । बन्धे व्यवस्थितौ काव्यं तद्विवाल्हावकारिणि ॥' -वक्रोक्तिजीवित (१८) इनके मत से कविता में शब्द और अर्थ दोनों का महत्त्व है। दोनों में कवि का वक्रता-सम्बन्धी कौशल अपेक्षित है । शब्द और अर्थ दोनों को सुगठित और सुसम्बद्ध होना आवश्यक है । कुन्तल ने काव्य में तद्विद् अर्थात् सहृदयों को आह्लाद देने का गुण भी स्वीकार किया है। इस परिभाषा में रस, रीति एवं गुण ( 'बन्धे व्यवस्थिती') और अलङ्कार तीनों को स्थान मिल जाता है किन्तु कुन्तल के विवेचन में मुख्यता अलङ्कारों की है, फिर भी वमोक्तिवाद १ पूरा श्लोक इस प्रकार है :- 'न स संकुचितः पन्था येन बाली हतो गतः। समये तिष्ठ सुग्रीव मा बालिपथमन्वगाः ।। -चा० रामायण (कि० काण्ड, २०१८1) अर्थात् हे सुग्रीव ! वह रास्ता संकुचित नहीं है जिससे यालि गया है (अर्थात् तुम भी मृत्यु-पथ पर जा सकते हो)। अपने समय (पाय) पर स्थिर रहो, बालि के अनुगामी मत बनो।