पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/५५

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


२: काव्य की परिभाषा ... भारतीय समीक्षा-क्षेत्र में लक्षण या परिभाषा का प्रश्न काव्य की आत्मा के सम्बन्ध में उठाया गया है क्योंकि आत्मा ही सार-वस्तु है । कुछ आचार्यों ने .... आत्मा का प्रश्न न उठाकर स्वतन्त्र रूप से भी परि- । भावपक्ष भाषा दी है। काव्य में दो पक्ष रहते हैं, एक अनुभूति और या भावपक्ष और दूसरा अभिव्यक्ति या कलापक्ष । यद्यपि .... 'कलापक्ष दोनों पक्षों का अपना-अपना महत्त्व है और दोनों ही ......... . एक-दूसरे से सम्बन्धित हैं तथापि मुख्यता भावपक्ष को ही दी जाती है । रस को काव्य की आत्मा मानने वाले प्राचार्य भावपक्ष को ही प्रधानता देते हैं। अलङ्कार और रीति को काव्य की आत्मा के पद पर प्रतिष्ठित करने वाले प्राचार्य अभिव्यक्ति को महत्त्व प्रदान करते हैं, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार कि कुछ दार्शनिक शरीर को ही आत्मा मान लेते हैं । रीति की गुणों द्वारा प्रात्मा तक पहुँच हो जाती है। ध्वनि और वक्रोक्ति-सम्प्रदाय वाले भीतरी पक्ष को स्वीकार तो अवश्य करते हैं किन्तु उनका झकाव अभि- व्यक्ति की ओर ही है। अलङ्कार, वक्रोक्ति और ध्वनि में कल्पना का भी थोड़ा कार्य पड़ता है। हमारे यहाँ भावपक्ष पर कुछ अधिक बल दिया गया है । पाश्चात्य देशों में कल्पनातत्त्व को विशेष प्राश्रय मिला है, इसका कारण यह है कि उनके यहाँ के समीक्षा-शास्त्र के आदि आचार्य अरस्तू ने कला को अनुकरण माना है । अनुकरण में मूर्तता की मुख्यता रहती है और मूर्तता का सम्बन्ध कल्पना से है। हमारे यहाँ के आदि आचार्य भरतमुनि ने भी नाटकों के सम्बन्ध से काव्य की विवेचना की है (जैसे अरस्तू ने), अनुकृति का भी प्रश्न, उठाया गया है किन्तु उन्होंने रस और भावों को ही मुख्यता दी है । यही भारतीय और पाश्चात्य मनोवृत्ति का अन्तर है । : भारतीय मनोवृत्ति कुछ भीतरी अधिक है और पाश्चात्य में बाहरी पर अधिक बल है। इसका यह अभिप्राय नहीं कि पाश्चात्य देशों में भीतरी पक्ष की उपेक्षा है। .: काव्य का मूल तत्त्व तो रागात्मक या भावतत्त्व ही है किन्तु उसके साथ