पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/६५

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३: काव्य और कला पाश्चात्य देशों में प्रायः काव्य की गणना कलाओं म की जाती है। वहाँ की विचारधारा से प्रभावित हिन्दी के कुछ प्राचार्यों ने भी काव्य को कलाओं में स्थान दिया है । प्राचार्य शुक्लजी ने पण्डित दृष्टिकोणभेद समाज का ध्यान इस ओर आकर्षित किया है कि भारतीय परम्परा में काव्य का क्षेत्र कलाओं से बाहर माना गया है। हमारे यहाँ कलाओं को उपविद्यानों में स्थान मिला है । काव्य को कला से स्वतन्त्र मानने की पुष्टि में महाराज भतृहरि का सुप्रसिद्ध वाक्यांश-'साहित्यसङ्गीतकलाविहीन:'-उपस्थित किया जाता है। यह कहा जाता है कि कला यदि साहित्य से भिन्न न होती तो उसका अलग उल्लेख न होता। इसके विपक्ष में यह कहा जा सकता है कि सङ्गीत भी कलानों में है किन्तु फिर भी कला का पृथक् उल्लेख हुआ है। यदि यह कहा जाय कि कला शब्द सङ्गीत के साथ लगता है तो वह साहित्य के साथ भी लग जाता है । किन्तु जो लोग काव्य को कला से स्वतन्त्र मानते हैं उनके तरकस में और भी तीर हैं । भामह ने काव्य के फलों में 'वैचक्षयकलासु च' बतलाया है। इससे भी यही प्रकट होता है कि काव्य कलाओं से स्वतन्त्र है। काव्य से कलाओं में वैचक्षण्य प्राप्त होता है, काव्य स्वयं कला नहीं है। प्राचार्य दण्डी ने देश-काल-विरोध की भाँति कला-विरोध भी एक दोष माना है। इसी प्रसन्न में उन्होंने कला को 'कामार्थसंश्रया' कहा है और नृत्य, गीत, वाद्य आदि कलाओं को उसके अन्तर्गत माना है :- . 'मृत्यगीतमभृतयः कलाकामार्थ संश्रयाः" -~-काव्यादर्श ( ३ । १६२ ) हमारे यहाँ चौंसठ कलाएँ मानी गई हैं, भिन्न-भिन्न ग्रन्थों में इनकी सूची कुछ हेर-फेर के साथ दी गई है। ये कलाएँ एक प्रकार से विदग्ध पुरुषों या स्त्रियों की शिक्षा के अङ्ग हैं। उनमें नाचना, गाना, तैरना, चित्र बनाना, फूलों