पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/६८

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सिद्धान्त और अध्ययन ___ हमारे यहाँ कला में सङ्गीत (जिसमें नृत्य, याचादि सभी माने गए है) और शिल्प (स्थापत्य, मूर्ति,तक्षण और चित्रकला) दोनों ही माने गए है.... कला शिसपे सङ्गीत भेदे च' (अमरकोष)। सङ्गीत का तो सम्बन्ध काव्य से कुछ-कुछ सीधा है ही किन्तु शिल्प का सम्बन्ध भी थोड़ी कठिनाई से रसों हारा लगाया जाता है। चित्र और मूत्तियों में भी रस की अभिव्यक्ति होती है। वास्तव में हमारे यहाँ काव्य कलाओं के अन्तर्गत नहीं है वरन् कला और काव्य बालेघर भिल होते हुए उनकी आत्मा एक है । काव्य की आत्मास्वरूप रस ही सलाओं को अनुप्राणित करता है । चौंसठ कलाओं में समस्यापत्ति के अतिरिक्त काव्य से सम्बद्ध और भी कलाएँ, जैसे प्रतिमाला (अंताक्षरी), नाटकों का अभिनय करना, नाटकों का देखना-दिखाना, कहानियों का वाहना-सुनना, अभिधान-कोष, छन्द का ज्ञान, प्रहेलिका आदि सब साहित्यिक विद्याएँ कलाओं में परिगणित हैं। काव्य का जितना मनोरञ्जक पक्ष है वह सब कलाओं में जाता है। हमारे यहाँ यह पक्ष उपविद्या-रूप से स्वीकृत हुआ है। जिस प्रकार विज्ञान का व्यावहारिक पक्ष्य तत्सम्बन्धी कलाओं में पाया जाता है उसी प्रकार काव्य का व्यावहारिक एवं मनो- रञ्जक पक्ष कलाओं में आजाता है । पाश्चात्य देशों में काव्य का सम्पूर्ण पक्ष कला के अन्तर्गत है। भारतीय परम्परा में उसका व्यावहारिक अर्थात् शिल्प- सम्बन्धी पक्ष कलानों में पाता है। उसमें जो कार के रूप पाये है धे दिल-बह- लाव और समय काटने के साधन-से है। काव्य की नीची श्रेणियों वाला में अवश्य प्राजाती हैं किन्तु ऊँची और नीची श्रेणियों का नितान्त पार्थषय भी नहीं हो सकता । 'काव्येषु नाटक रम्यम्' और नाटकों में सभी कलाओं का समावेश हो जाता है । इस प्रकार नाटक, काव्य और कलाओं के सम्बन्ध-सूत्र बन जाते हैं। इस सम्बन्ध में डाक्टर हजारी प्रसाद जी द्विवेदी का वक्तव्य पठनीय है :....... 'मेरा वक्तव्य यह है कि काव्य नामक यह कला जो कवियों को गोष्ठियों, समाजों और राजसभाओं में तरकाल सम्मान देती थी वह उक्तिव चिध्य-मात्र थी।.........'यही कारण है कि पुराने अलङ्कारशास्त्रों में रस की उतनी परवाह नहीं की गई जितनी अलकारों, गुणों और दोषों की ।' -अशोक के फूल (पृष्ठ १२३) - वास्तव में यह झगड़े इसीलिए उठते हैं कि काव्य और कला दोनों के ही बोध में अन्तर होता रहा है । इस सम्बन्ध में द्विवेदी जी लिखते है :...- . 'वस्तुत: जिन दिनों काव्य को कला कहा गया था उन दिनों उसके इन्हीं दो गुणों का प्राधान्य लघय किया गया था। (1) उक्तिवैचिश्य और(२)सहवय- हृदय-रक्षन । ज्यों-ज्यों अनुभव का चेन और विचार का क्षेत्र विस्तीर्ण होता