पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/७६

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


३८ सिद्धान्त और अध्ययन प्रतीकात्मक (Symbolic) परोक्ष भाव भी रहता है । सूर्योदय निमकला में भी एक भौतिक घटना-मान नहीं रहता वरन् आशा का प्रतीक बन जाता है। ____ काव्य के वर्णनों के ही चित्र नहीं बने हैं वरन् सङ्गीत की राग-रागनियों के भी चित्र बनाये गये हैं। उनमें सङ्गीत के अनुपाल वातावरण सो उपस्थित कर ही दिया जाता है किन्तु जो राग जिस रस से सम्बन्धित है उसकी भी अशि- व्यक्ति हो जाती है। इस प्रकार कालगत बस्तु देशगत बना दी जाती है। .. ' नृत्त में तो ताल के अनुकूल पद-सञ्चालन होने के कारण काल की ही प्रधानता रहतो है किन्तु नृत्य में मूक अभिनय के रहने से जीवन के निथ भी उपस्थित किये जाते हैं। नृत्य में भावों की अनुकृति रहने के हेतु वह दृश्यकाव्य के निकट आजाता है। वाद्य की भांति नृत्य का सम्बन्ध केवल श्रवणेन्द्रिय से नहीं वरन् नेत्रों से भी है। इस प्रकार हम देखते हैं कि चाहे पाश्चात्य देशों की भांति काव्य को कलाओं के अन्तर्गत न मानें किन्तु काव्य का अध्ययन कलाशों से वियुक्त मान- कर नहीं कर सकते हैं । हमारे यहाँ चाहे काव्य कला के अन्तर्गत न रहा हो किन्तु काव्य का एक भेद कलाश्रित अर्थात् कला को अपना विषय बनाने वाला रहा है। भामह ने---'कलाशास्त्राश्रय' (काव्यालङ्कार, १.१७)-नाम से काव्य का एक चौथा भेद माना है। किसी काल-विशेष की काव्य-सम्बन्धी तथा चित्रकला सम्बन्धी प्रवृत्तियों का अध्ययन करें तो उनमें कुछ समानता मिलेगी। रविवर्मा की चित्रकला तथा मैथिलीशरणजी की प्रारम्भिक कविताओं में द्विवेदीयुग की इतिवृत्तात्मकता तथा उपदेशात्मकता की प्रवृत्ति परिलक्षित होती है, इसी प्रकार प्राचीन भार- तीय चित्रकला में भौतिक मान और अनुपात की अपेक्षा भाव का प्राधान्य मिलता हैं । उसमें वस्तुवाद की अपेक्षा आदर्शवाद अधिक है। यही बात' कार में भी मिलती है । बङ्गाल के चित्र में भी छायावादी कविता की शांति स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्म की प्रवृत्ति अधिक है । पालोचक किसी समय या देश के काव्य के अध्ययन करते समय उस समय वा देश की अन्य कलाओं की स्थिति पर विचार किये बिना नहीं रह सकता है। यदि पाश्चात्य देशों में काव्य का कलानों के साथ अध्ययन किया जाता है तो उससे विशेष विचिलित होने की बात नहीं है । अन्तर केवल इतना है कि पाश्चात्य देशों में धाष्य को भी कलानों की अनुकृति-प्रधान दृष्टि से देखा गया है. किन्तु इसके विपरीत हमारे यहाँ कलाशों का विवेचन भी काव्य में मान्य रस और भाव की दृष्टि को मुख्यता देकर किया गया है। इस दृष्टि से डाक्टर श्यामसुन्दरदासजी के 'हिन्दी भाषा और साहित्य' में