पृष्ठ:सिद्धांत और अध्ययन.djvu/९

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है । अलङ्कार की प्रवृत्ति बढ़ने पर काव्यशास्त्र-सम्बन्धी प्राथों में भी अलङ्कारों को ही महत्ता मिली । काव्यशास्त्र के इतिहास में भी बाहर की ओर से भीतर की पोर की प्रवृत्ति पाते हैं--पहले शरीर फिर प्रात्मा । नाटकों की भाँति अलङ्कारों में भी वाह्य आकर्षण का आधिक्य रहता है । यद्यपि रूपकादि अलङ्कारों का व्यावहारिक रूप से वैदिक साहित्य में भी प्रयोग हुआ है और निरुक्त आदि में उनका नामोल्लेख भी हुआ है। इसके अतिरिक्त 'वेदान्त-सूत्र' में उपमा ('अतएव चोपमासूर्यकादिवत्', ३१२११८) और रूपक ('शरीररूपकविन्यस्त- गृहीतेर्दर्शयति च', १।४।१ ) शब्द आये हैं, फिर भी उनका विधिवत् निरू- परण पहले-पहल भरतमुनि के 'नाद्यशास्त्र में ही मिलता है। उन्होंने वाचिक अभिनय के सहारे चार अलङ्कारों (उपमा, रूपक, दीपक और यमक) का वर्णन किया है :-- 'उपमारूपकं चैव दीपकं यमकं तथा । अलङ्कारास्तु विज्ञ याश्चत्वारो नाटकाश्रयाः ॥' -नाट्यशास्त्र (१७।४३) ...इन प्रलङ्कारों का प्रयोग रस के आश्रित बताया गया है। भरतमुनि के पश्चात् हमारे प्राचार्यों का भी ध्यान अलङ्कारों की ओर गया (स्वयं 'अग्नि- पुराण' की प्रवृत्ति भी अलङ्कारों की ओर है ) किन्तु इतनी ध्यान रखने की बात है कि पूर्वाचार्या ने अलङ्कारों को व्यापक रूप में लिया, था । काव्य में सौन्दर्योत्पादन के सारे उपकरणों को उन्होंने अलङ्कार माना है-'सौन्दर्य- मलङ्कारः' (वामन)। . १. जैसे वृहदारण्यक उपनिषद में कहा गया है जैसे प्रिया स्त्री के साथ आलिङ्गन में पुरुष को न वाह्य का और न अन्तर का ध्यान रहता है वैसे ही आत्मा के परमात्मा के साथ सम्पर्क में आने पर पुरुष को भीतर और बाहर का ज्ञान नहीं रहता-'तद्यथा प्रियया स्त्रिया संपरिक्यतो एवमेवायं पुरुषः....... (वृहदारण्यक, ४।३।२१) । कठोपनिषद में श्रात्मा को रथी और शरीर को रथ बनाकर पूरा साङ्गरूपक बनाया है-'पास्मान रथिक विद्धि शरीर रथमेवतु । बुद्धि तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च' (कठोप- निषद, १।३।३) । मुण्डकोपनिषद में बताया गया है कि जिस प्रकार रथ के पहिए की नाभि (नाय) से आरे सम्बन्धित रहते हैं उसी प्रकार हृदय से नाड़ियाँ सम्बन्धित रहती हैं-'परा इव स्थनामी संहता यत्र माझ्यः' (मुण्डकोपनिषद, २।६) । यह उपमा का बहुत सुन्दर उदाहरण है।