पृष्ठ:सुखशर्वरी.djvu/४

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श्रीः प्रथम संस्करण की भूमिका । प्रेम और प्रेमत्व को सभी चाहते हैं, पर इसका उपाय बहुत कम लोग जानते होंगे। प्रेमिक प्रेम पाने के लिये व्याकुल तो होते हैं, सभी अपने लिये दूसरे को पागल करना चाहते हैं, पर अभी तक इसका उपाय कितनों ने नहीं जाना है। इसका अभाव केवल उपन्याम ही दूर करता है, इसलिये प्राचीनतम कवियों ने और सांप्रतिक यूरोपीय कवियों ने उपन्यास की सृष्टि की। जो बात झूठ-सच से नहीं होतो, तंत्र मंत्र यंत्र से नहीं बनती, वह प्रेम के विज्ञान " उपन्याम " से सिद्ध होती है। इसके बिना किसी को वश वा संमोहित नहीं कर सकते । इन सभों के साधन का एकमात्र प्रधान शस्त्र तंत्रस्वरूप उपन्यास ही है। इसके पढ़ने से मनुष्य के हृदय के ऊपर बड़ा असर होता है और सब बात बनजाती है। प्रेम उत्पन्न होने से उसको स्थिर करना चाहिए, उसीसे प्रकृत सुख मिलता है । इसलिये प्रेम को वृद्धि और उसके आस्वाद के लिये उपन्यास महौषधि स्वरूप है। जो प्रेम के पिपासू हैं, वे इसमें प्रेम को ज्वलन्तछबि देख कर शीतल होते हैं। जिसके हदय में सदा प्रेम की तरंग उठा करती है, और जिसका हदय प्रेम का नवविकसित कानन है, उसके लिये उपन्यास हृदयमणि के तुल्य है। ___ इसमें प्रेम की प्रबलता, प्रणय की उन्मत्तता, चाह की मत्तता, यौवन का पूर्ण बिकाश, लालसा का प्रबल प्रवाह, कामना का वेग, रम की तरंग, प्रीति की लहरी, सभी कुछ रहते हैं। इसीलिये कवियों ने साहित्यश्रेणी में उपन्यास को श्रेष्ठ गद्दी दी है। १ अक्तूबर, मन् १८६१ ई०) आरा रसिकानुगामी, श्रीकिशोरीलालगोस्वामी ।