पृष्ठ:सुखशर्वरी.djvu/५७

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Firint: titilittHTRA सुन्दरी होकर जो एक साधारण रूप और विद्या वाले दरिद्र प्रेमदास के ऊपर निछावर होगई, इसे केवल सच्ची चाह की महिमा जाननेवाली सहज ही अनुभव कर लेंगी। सुबदना प्रेमदास की बाट देखती हुई बाहर बैठी थी। थोडी देर में भयानक चीत्कार करते करते प्रेमदास भागते भागते, कांपते कांपते, हांफते हांफते सामने उपस्थित हुए !!! उनके इस अलौकिक काम से सभी चमत्कृत हुए. ! सुबदनी ने हँसकर पूछा,-"क्यों जी ! क्या बात है ?" प्रेमदास सुबदना की ओर देख कर कांपते का यते घोले,-"मैं जब पुष्करिणी में नहाने गया था, उसी समय दो सवार ! हाय भयानक तरवार की वर्षा !!! बड़े बली और और--- सबदना,-"अश्वारोही ?-क्या कहा ? घबड़ाओ मत, सम्हल कर धीरे धीरे कहो। प्रेसदास,-"उन लोगों ने मुझसे पूछा कि, 'रामशङ्कर को जानते हो ? वह कहां है, कह सकते हो' ? " सबदना,-"तो उन्होंने इतना ही पूछा, तुम अब इतना कांपते क्यों हो?" प्रेमदास,-"सबदना! वे डांट डांट कर मुझसे पूछते थे। दूसरा कोई होता तो उन यमदूतों के आगे से जीता जागता न फिरता।" सबदना ने हँसकर कहा,-"तो तुम कैसे फिरे ?" प्रेमदास,-मेरा श्रेष्ठ कुल में जन्म है, मैं ब्राह्मण हूं। वे दोनों यवन थे, क्या सर्वनाश!!!" सुबदना,-"तो तुम्हें ब्राह्मण जानकर छोड़ दिया ? ए ! " प्रेमदास,-"बस, और क्या?" सुबदना,-"प्रेमदास! तुम तो साहसी हौ, अब तुम्हारी हिम्मत क्या हुई ? अस्तु तुमने क्या उत्तर दिया ? ” प्रेमदास,-"सुबदना! पहिले मुझे बहुत साहस था, किन्तु मैने कहा कि, 'मैं रामशङ्कर को नहीं जानता, वह मेरा कोई नहीं है; मैंने उसे देखा भी नहीं, उसने भी मुझे न देखा होगा!" सुबदना,-"प्रेमदास ! तुम तो बड़े झूठे हौ ! रामशङ्कर तो तुम्हारे मालिक का बैरी है न ? " SHRIES