पृष्ठ:सेवासदन.djvu/१०१

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सुमन-कह तो मैं आपको लज्जित करने के लिये रही हूँ लेकिन बातें सच्ची है। इन बातों को बहुत दिन हुए। मैंने सब भुला दिया था लेकिन इस समय आपने मेरी परछाई से भी दूर रहने की कोशिश करके वे सब बातें मुझे याद दिला दी। लेकिन अब मुझे स्वयं पछतावा हो रहा है, मुझे क्षमा कीजिये।

शर्माजी ने सिर न उठाया, फिर विचार मे डूब गये। सुमन उन्हें धन्यवाद देने आई थी, लेकिन बातों का कुछ क्रम ऐसा बिगडा़ कि उसे इसका अवसर ही न मिला और अब इतनी अप्रिय बातों के बाद उसे अनुग्रह और कृपा की चर्चा असंगत जान पड़ी। वह अपनी बग्घी की ओर चली। एकाएक शर्माजी ने पूछा-और कंगन?

सुमन--यह मुझे कल सर्राफे में दिखाई दिया। मैंने बहूजी के हाथों में इसे देखा था, पहचान गई; तुरन्त वहाँ से उठा लाई।

शर्मा--कितना देना पड़ा?

सुमन-कुछ नहीं, उलटे सर्राफे पर और धौंस जमाई।

शर्मा-सर्राफ का नाम बता सकती हो।

सुमन-नहीं, वचन दे आई हूँ। यह कहकर सुमन चली गई। शर्माजी कुछ देर तक तो बैठे रहे, फिर बेंचपर लेट गये। सुमन का एक एक शब्द उनके कानों में गूँज रहा था। वह ऐसे चिंतामग्न हो रहे थे कि कोई उनके सामने आकर खड़ा हो जाता तो भी उन्हे खबर न होती। उनके विचारों ने उन्हें स्तंभित कर दिया था। ऐसा मालूम होता था मानों उनके मर्मस्थान पर कड़ी चोट लग गई है, शरीर में एक शिथिलता सी प्रतीत होती थी। वह एक भावुक मनुष्य थे। सुभद्रा अगर कभी हँसी में भी कोई चुभती हुई बात कह देती तो कई दिनों तक वह उनके हृदय को भयभीत रहती थी। उन्हें अपने व्यवहार पर, आचार विचार पर, अपने कर्तव्यपालन पर अभिमान था। आज वह अभिमान चूर-चूर हो गया। जिन अपराध को उन्होंने पहले गजाधर और विट्ठलदास के सिर मढ़कर अपने को संतुष्ट किया था, वही आज सौगुने बोझले बाते उनके सिर पर लद गया! सिर हिलाने की भी जगह न थी। वह इस अपराध से दबे जा रही थी। विचार तीव्र होकर