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सेवासदन
 


वहाँ पता न था, इस पर वह घबराई। अपने कमरे के प्रत्येक ताक और आालमारी को देखा, रसोई के कमरे में जाकर चारों ओर ढूँढा घबराहट और भी बढ़ी। फिर तो उसने एक-एक सन्दूक, एक एक कोना छान मारा मानो कोई सूई ढूँढ रही है, लेकिन कुछ पता न चला। महरी से पूछा तो उसने बेटे की कसम खाकर कहा, मैं नहीं जानती। जीतन को बुलाकर पूछा, वह बोला, मालकिन, बुढ़ा यह दाग मत लगाओ मुझ पर। सारी उमिर भले भले आदमियों की चाकरी ही में कटी है, लेकिन कभी नीयत नही बिगाड़ी, अब कितने दिन जीना है कि नीयत बद करूँगा। सुभद्रा हताश हो गई, अब किससे पूछे? जी न माना, फिर सन्दूक, कपडो की गठरियाँ आदि खोल-खोलकर देखी। आटा दाल की हाँडियाँ भी न छोड़ी, पानी मटकी पे हाथ डालडाल कर टटोला पानी ना मिलने पर निराश होकर चारपाई पर लेट गई। उसने सदन को स्नान गृह में जाते देखा था, शंका हुई कि उसी ने हंसी से छिपाकर रखा हो, लेकिन उससे पूछने की हिम्मत न पड़ी। सोचा शर्मा जी घुमकर खाना खाने आयें तो उनसे कहूँगी। ज्योंही शर्मा जी घर में आये। सुभद्रा ने उनसे रिपोर्ट की! शर्मा जी कहा अच्छी तरह देखो, घर ही में होगा, ले कौन जायेगा?

सुभद्रा—घर की एक एक अँगुल जमीन छान डाली।

शर्मा जी-—नौकरो से पुछा?

सुभद्रा सबसे पूछा, दोनो कसम खाते है, मुझे खूब याद है कि मैंने उसे नहाने के कमरे मे ताकपर रख दिया था।

शर्मा जी-तो क्या उसके पर लगे थे जो आप ही उड़ गया?

सुभद्रा—नौकरो पर तो मेरा सन्देह नहीं है।

शर्माजी-तो दूसरा कौन ले जायगा?

सुभद्रा-—कहो तो सदन से पूछूँ? मैं ने उसे उस कमरे में जाते देखा था, शायद दिल्लगी के लिये छिपा रखा हो।

शर्मा जी-—तुम्हारी भी क्या समझ है। उसने छिपाया होता तो कह न देता?