पृष्ठ:सेवासदन.djvu/११०

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सेवासदन
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बटाओ तो मैं धरती और आकाश एक कर दूँगा लेकिन क्षमा करना, तुम्हारे संकल्प दृढ़ नहीं होते। अभी यों कहते हो, कल ही उदासीन हो जाओगे। ऐसे कामों मे धैर्य की जरूरत है। शर्माजी लज्जित होकर बोले, ईश्वर चाहेगा तो अबकी आपको इसकी शिकायत न रहेगी।

विट्ठल—तब तो हमारा सफल होना निश्चित् है।

शर्मा-यह तो ईश्वर के हाथ है। मुझे न तो बोलना आता है, न लिखना आता है, बस आप जिस राह पर लगा देगे, उसी पर आँख बन्द किये चला जाऊँगा।

विट्ठल-अजी सब आ जायेगा, केवल उत्साह चाहिये। दृढ़ संकल्प हवा मे किले बना देता है, आपकी वक्तृताओं में तो वह प्रभाव होगा कि लोग सुनकर दंग हो जायेगे। हाँ, इतना स्मरण रखियेगा कि हिम्मत नहीं हारनी चाहिये।

शर्मा-आप मुझे सँभाले रहियेगा।

विट्ठल-अच्छा, तो अब मेरे उद्देश्य भी सुन लीजिये। मेरा पहला उद्देश्य है, वेश्याओं को सार्वजनिक स्थानों से हटाना और दूसरा, वेश्याओं के नाचने गाने की रस्म को मिटाना। आप मुझसे सहमत है या नहीं?

शर्मा-क्या अब भी कोई संदेह है?

विट्ठल-नाच के विषय में आपके वह विचार तो नही है?

शर्मा-अब क्या एक घर जलाकर भी वही खेल खेलता रहूँगा? उन दिनो मुझे न जाने क्या हो गया था, मुझे अब यह निश्चय हो गया है कि मेरे उसी जलसे ने सुमनबाई को घर से निकाला! लेकिन यहाँ मुझे एक शंका होती है। आखिर हम लोगों ने भी तो शहरो ही में इतना जीवन व्यतीत किया है, हम लोग इन दुर्वासनाओं में क्यों नहीं पड़े? नाच भी शहर में आये दिन हुआ ही करते है, लेकिन उनका ऐसा भीषण परिणाम होते बहुत कम देखा गया है। इससे यही सिद्ध होता है कि इस विषय में मनुष्य का स्वभाव ही प्रधान है। आप इस आन्दोलन से स्वभाव तो नहीं बदल सकते।