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सेवासदन
 

विठ्ठल-हमारा यह उद्देश्य ही नहीं, हम तो केवल उन दशाओं का संशोधन करना चाहते है जो दुर्बल स्वभाव के अनुकल है, और कुछ नहीं चाहते। कुछ मनुष्य जन्म ही से स्थूल होते हैं, उनके लिये खाने पीने की किसी विशेष वस्तु की जरूरत नहीं, कुछ मनुष्य ऐसे होते हैं जो घी-दूध आदि का इच्छा पूर्वक सेवन करने से स्थूल हो जाते हैं और कुछ लोग ऐसे होते हैं जो सदैव दुबले रहते है, वह चाहे घी दूध के मटके ही में रख दिये जाँय तो भी मोटे नहीं हो सकते। हमारा प्रयोजन केवल दूसरी श्रेणी के मनुष्यों से है। हम और आप जैसे मनुष्य क्या दुर्व्यसन में पडेंगे, जिन्हें पेट के धन्धों से कभी छुट्टी ही नहीं मिली, जिन्हें कभी यह विश्वास ही नहीं हुआ कि प्रेम की मंडी में उनकी आवभगत होगी। वहाँ तो वह फँसते है जो धनी है, रूपवान् है, उदार है, रसिक है। स्त्रियों को अगर ईश्वर सुन्दरता दे तो धन से वंचित न रखे, धनहीन सुन्दर चतुर स्त्री पर दुर्व्यसन का मन्त्र शीघ्र ही चल जाता है।

सुमन पार्क से लौटी तो उसे खेद होने लगा कि मैंने शर्माजी को वे जी दुखाने वाली बातें क्यों कही? उन्होने इतनी उदारता से मेरी सहायता की, जिसका मैंने यह बदला किया? वास्तव में मैंने अपनी दुर्बलता का अपराध उनके सिर मढा। संसार में घर-घर नाच गाना हुआ ही करता है, छोटे बड़े दीन दुखी सब देखते है कि और आनन्द उठाते है। यदि मैं अपनी कुचेष्टाओं के कारण आग में कूद पड़ी तो उसमें शर्माजी का या किसी और का क्या दोष? बाबू विट्ठलदास शहर के आदमियों के पास दौड़े, क्या वह उन सेठों के पास न गये होगे जो यहाँ आते है? लेकिन किसी ने उनकी मदद न की, क्यों? इसलिये न की कि वह नहीं चाहते है कि मैं यहाँ से मुक्त हो जाऊँ? मेरे चले जाने से उनको कामतृष्णा में विघ्न पड़ेगा, वह दयाहीन व्याघ्र के समान मेरे हृदय को घायल करके मेरे तड़पने का आनन्द उठाना चाहते है। केवल एक ही पुरुष है, जिसने मुझे इस अन्धकार से निकालने के लिये हाथ बढा़या, उसी का मैंने इतना अपमान किया।

मुझे मनमें कितना कृतघ्न समझेंगे। वे मुझे देखते ही कैसे भागे।