पृष्ठ:सेवासदन.djvu/११२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ जाँच लिया गया।
सेवासदन
१२९
 

चाहिये तो यह था कि मै लज्जा से वहीं गड़ जाती, लेकिन मैंने इस पापभय के लिये इतनी निर्लज्जता से उनका तिरस्कार किया ! जो लोग अपने कलु- षित भावों से मेरे जीवन को नष्ट कर रहे है, उनका मैं कितना आदर करती हूँ। लेकिन जब, व्याधा पक्षी को अपने जाल में फंसते नहीं देखता तो उसे उसपर कितना क्रोध आता है ! बालक जब कोई अशुद्ध वस्तु छू लेता है तो वह अन्य बालकों को दौड़ दौड़कर छूना चाहता है, जिसमें वह भी अप- वित्र हो जायें । क्या मैं भी हृदयशून्य व्याधा हूँ या अबोध बालक ? -

किसी ग्रन्थकार से पूछिये कि वह एक निष्पक्ष समालोचक के कटुवाक्यों के सामने विचारहीन प्रशंसा का क्या मूल्य समझता है । सुमन को शर्माजी की यह घृृृृणा अन्य प्रेमियों की रसिकता से अधिक प्रिय मालूम होती थी।

रात भर वह इन्ही विचारों में डूबी रही । मन में निश्चय कर लिया कि प्रातःकाल विट्ठलदास के पास चलूंगी और उनसे कहूंगी कि मझे आश्रय दीजिये । मैं आपसे कोई सहायता नहीं चाहती, केवल एक सुरक्षित स्थान चाहती हूँ, चक्की, पीसूंगी, कपड़े सीऊँगी, और किसी तरह अपना निर्वाह कर लूंगी।

सवेरा हुआ। वह उठी और विट्ठलदासके घर चलनेकी तैयारी करने लगी कि इतनेमें वह स्वयं आ पहुँचे । सुमन को ऐसा आनन्द हुआ जैसे किसी भक्त को आराध्यदेव के दर्शन से होता है । बोली, आइये महाशय ! तो कल दिन भर आपकी राह देखती रही, इस समय आपके यहाँ जाने का विचार कर रही थी।

विठ्ठलदास--कल कई कारणों से नही आ सका।

सुमन--तो आपने मेरे रहने का कोई प्रबन्ध किया ?

विट्ठल--मुझसे तो कुछ नहीं हो सका लेकिन पद्मसिंहने लाज रख ली। उन्होने तुम्हारा प्रण पूरा कर दिया । वह अभी मेरे पास आये थे और वचन दे गये है कि तुम्हे ५०) मासिक आजन्म देते रहेंगे।

सुमन के विस्मयपूर्ण नेत्र सजल हो गये। शर्माजीकी इस महती उदारता ने उसके अन्तःकरण को भक्ति, श्रद्धा और विमल प्रेम से प्लावित कर