पृष्ठ:सेवासदन.djvu/१४५

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ जाँच लिया गया।
१६०
सेवासदन
 


और नतिक सिद्धान्तों का शत्रु हो जाता है। नहीं, वह साधारण बुद्धि के मनुष्य थे। कायल होकर बतबढाव करते रहना उनकी सामर्थ्य से बाहर था। मुस्कुराकर मुन्शी बैजनाथ से बोले, कहिये मुन्शीजी, अब क्या कहते है? है कोई निकलनेका उपाय?

बैजनाथ ने हँसकर कहा,मुझे तो रास्ता नहीं सूझता।

मदन—अजी कुछ कठहुज्जती ही करो।

बैजनाथ- कुछ दिनों वकालत पढ ली होती तो यह भी करता। यहाँ अब कोई जवाब ही नहीं सूझता। क्यो भैया पद्मसिंह,मान लो तुम मेरी जगह होते तो इस समय क्या जवाब देते?

पद्मसिंह-(हँसकर) जवाब तो कुछ न कुछ जरूर ही देता, चाहे तुक मिलती या न मिलती।

मदन—इतना तो मैं भी कहूँँगा कि ऐसे जलसोसे मन अवश्य चंचल हो जाता है। जवानी में जब मैं किसी जलसोसे लौटता तो महीनों तक उसी वेश्या के रग-रूप हाव-भावकी चर्चा किया करता।

बैजनाथ—भैया, पद्मसिंहके ही मनकी होने दीजिये,लेकिन कम्बल अवश्य बँटवाइये।

मदन-एक कुआँँ बनवा दिया जाय तो सदाके लिए नाम हो जायगा। इधर भाँवर पड़ी उधर मैने कुएँँकी नीव डाली।

२५

बरसातके दिन थे, घटा छाई हुई थी। पण्डित उमानाथ चुनारगढ़ के निकट गगा के तटपर खडे नाव की बाट जोह रहे थे। वह कई गाँवो का चक्कर लगाते हुए आ रहे थे और सन्ध्या होने से पहले चुनारके पास एक गाँवमे जाना चाहते थे। उन्हें पता मिला था कि उस गाँवमें एक सुयोग्य वर है। उमानाथ आज ही अमोला लौट जाना चाहते थे, क्योकि उनके गाँवमें एक छोटी सी फौजदारी हो गई थी और थानेदार साहब कल तहकीकात करने आनेवाले थे। मगर अभी तक नाव उसी पार खड़ी थी। उमानाथ