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सेवासदन
१६१
 


को मल्लाहों पर क्रोध आ रहा था। इससे अधिक क्रोध उन मुसाफिरों पर आ रहा था जो उस पार धीरे-धोरे नावपर बैठने आ रहे थे। उन्हें दौड़ते हुए आना चाहिए था, जिसमें उमानाथ को जल्द नाव मिल जाय। जब खड़े-खड़े बहुत देर हो गई तो उमानाथ ने जोर से चिल्लाकर मल्लाहों को पुकारा। लेकिन उनकी कण्ठ-घ्वनि को मल्लाहों के कान में पहुँचने की प्रबल आकांक्षा न थी। वह लहरों से खेलती हुई उन्हीं में समा गई।

इतने में उमानाथ ने एक साधु को अपनी ओर आते देखा। सिरपर जटा, गले में रुद्राक्ष की माला, एक हाथ मे सुलफे की लम्बी चिलम, दूसरे हाथ में लोहे की छड़ी, पीठपर एक मृगछाला लपेटे हुए आकर नदी के तटपर खड़ा हो गया। वह भी उस पार जाना चाहता था।

उमानाथ को ऐसी भावना हुई कि मैंने इस साधु को कहीं देखा है, पर याद नही पड़ता कि कहाँ। स्मृति पर एक परदा-सा पड़ा हुआ था।

अकस्मात् साधु ने उमानाथ की ओर ताका और तुरन्त उन्हे प्रणाम करके बोला, महाराज घर पर तो सब कुशल है, यहाँ कैसे आना हुआ।

उमानाथ के नेत्र पर से परदा हट गया। स्मृति जागृत हो गई। हम रूप बदल सकते है, शब्द को नहीं बदल सकते। यह गजाधर पांडे थे।

जब से सुमन का विवाह हुआ था, उमानाथ कभी उसके पास नहीं गये थे। उसे मुँह दिखाने का साहस नहीं होता था। इस समय गजाधर को इस भेष में देखकर उमानाथ को आश्चर्य हुआ। उन्होनें समझा, कहीं मुझे फिर धोखा न हुआ हो। डरते हुए पूछा, शुभ नाम?

साधु-पहले तो गजाधर पांडे था, अब गजानन्द हूँ।

उमानाथ-ओहो तभी तो मे पहचान न पाता था। मुझे स्मरण होता था कि मैंने कहीं आपको देखा है, पर आपको इस भेष में देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है। बाल बच्चे कहाँँ है।

गजानन्द—अब उस मायाजाल से मुक्त हो गया।

उमानाथ—सुमन कहाँ है?

गजानन्द—दालमण्डी के एक कोठेपर।