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सेवासदन
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हाजीहाशिम बुड़बुड़ाये, मुन्शी अबुलवफाके तेवरोंपर बल पड़ गये। तेगअलीकी तलवारने उन्हें घायल कर दिया। अबुलवफा कुछ कहना ही चाहते थे कि शाकिरबेग बोल उठे,भाई साहब, यह तान तजका मौका नहीं। हम अपने घर में बैठे हुए एक अमर के बारे में दोस्ताना मशाविरा कर रहे है। जवाने तेंज मसलेहत के हकमे जहरे कातिल है। मैं शाहिदान तन्नाज को निजाम तमद्दत में बिल्कुल बेकार या मायाए शर नही समझता। आप जब कोई मकान तामीर करते है तो उसमे बदरौर बनाना जरूरी ख्याल करते है। अगर बदरीर न हो तो चन्द दिनों में दीवारों की बुनियादे हिल जायें। इस फिरके को सोसाइटी का बदरौर समझना चाहिए और जिस तरह बदरीर मकान के नुमाया हिस्से में नही होती, बल्कि निगाह से पोशीदा एक गोशे में बनाई जाती है उसी तरह इस फिरके को शहरके पुरफिजा मुका- मात से हटाकर किसी गोशे में आबाद करना चाहिए।

मुन्शी अबुलवफा पहले के वाक्य सुनकर खुश हो गये थे, पर नाली की उपमापर उनका मुंह लटक गया। हाजीहाशिम ने नैराश्य से अब्दुल्लतीफी ओर देखा, जो अबतक चुपचाप बैठे हुए थे और बोले,जनाब, कुछ आप भी फरमाते है। दोस्ती के बहाव में आप भी तो नहीं बह गये?

अब्दुल्लतीफ बोले, जनाब, रिन्दाको न इत्तहाद से दोस्ती न मुखालिफत से दुश्मनी। अपना मुशरिब तो सुलहेकुल है। मैं अभी यही है नहीं कर सका कि आलम वे दारी में हैं या ख्याव में। बड़े-बडे आलमो को एक बे सिर- पैर की वात की ताईद में जमी और आसमान के कुलावे मिलाते देखता हूँ। क्योंकर बाबर कहें कि बेदार हूँ? साबुन, चमड़े और मिट्टी के तेल की दुकानों से आपको कोई शिकायत नही। कपड़े, बरतन आदवियात की दुकानें चीकमे है, आप उनको मुतलक वेमौ का नहीं समझते। क्या आपकी निगाहों में हुस्न की इतनी भी वकअत नहीं ? और क्या यह जरूरी है कि इसे किसी तग तारीक कूचे वद कर दिया जाय ? क्या वह बागवाग कहलानेका मुश्तहक है। जहॉ सरोकी कतारें एक गोशे में हों,बेले और गुलाब के तख्ते दूसरे गोशे में और रविशो के दोनो तरफ नीम और कटहल के दरख्त हों, बस्तमे पीपल ठूठ और

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