पृष्ठ:सेवासदन.djvu/१९४

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सेवासदन २१९


अलौकिक सौदर्यमूतियों को एक बार आँख भरकर देखा, जैसे कोई विद्यार्थी महीनों के कठिन परिश्रम के बाद परीक्षा से निवृत्त होकर अमोद प्रमोद मे लीन हो जाय। एक निगाह से मन तृप्त न हुआ तो उसने फिर निगाह दौड़ाई, यहाँ तक कि उसकी निगाहों उस तरफ जम गई और बह चलना भूल गया। मूर्ति के समान खड़ा रहा।जब जुलूस निकल गया तो उसे सुधि आई चौका,मन को तिरस्कृत करने लगा। तूने महीनों की कमाई एक क्षण में गंवाई? वाह!मैने अपनी आत्माका कितना पतन कर दिया? मुझमें कितनी निर्बलता है? लेकिन अन्तमें उसने अपने को समझाया कि केवल इन्हें देखने ही से मै पापका भागी थोड़े ही हो सकता हूँ?मैने इन्हे पाप-दृष्टि से नहीं देखा। मेरा हृदय वासनाओं से पवित्र है। परमात्मा की सौंदर्य सृष्टि से पवित्र आनन्द उठाना हमारा कर्तव्य है।

यह सोचते हुए वह आगे चला, पर उसकी आत्माको सतोष न हुआ। मैं अपने ही को धोखा देना चाहता हूँ? यह स्वीकार कर लेने से क्या आपत्ति है कि मुझसे गल्ती हो गई,हाँ हुई और अवश्य हुई। मगर मन की वर्तमान अवस्था के अनुसार मैं उसे क्षम्य समझता हूँ। मैं योगी नहीं,सन्यासी नहीं,एक बुद्धिहीन मनुष्य हूँ। इतना ऊंचा आदर्श सामने रखकर मै उसका पालन नही कर सकता। आह! सौंदर्य भी कैसी वस्तु है। लोग कहते हैं कि अधर्म से मुख की शोभा जाती रहती है। पर इन रमणियों का अधर्म उनकी शोभा को और भी बढाता है। कहते है मुख सौदर्य का दर्पण है। पर यह बात भी मिथ्या ही जान पड़ती है।

सदनने फिर मनको सँभाला और उसे इस ओर से विरक्त करनेके लिये इस विषयके दूसरे पहलूपर विचार करने लगा। हाँ वे स्त्रियाँ बहुत ही सुन्दर है, बहुत ही कोमल है, पर उन्होंने अपने इन स्वर्गीय गुणों का कैसा दुरुपयोग किया है। उन्होंने अपनी आत्मा को कितना गिरा दिया है। हां! केवल इन रेशमी वस्त्रों के लिये इन जगमगाते हुए आभूषणों के लिये‌ उन्होंने अपनी आत्माओं का विक्रय कर डाला है। वे आंखे जिनसे प्रेम की ज्योति निकलनी चाहिये थी, कपट कटाक्ष और कुचेष्टाओं से भरी हुई है।