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सेवासदन
 

सुमन-—मैने कुछ उडा़ तो नही दिए।

गजाघर—उड़ाये नही, पर यह तो तुम्हें मालूम था कि इसी में महीने भर चलाना है। उसी हिसाब से खर्च करना था।

सुमन-—उतने रुपयो मे बरकत थोड़े ही हो जायगी।

गजाधर-तो मैं डाका तो नही मार सकता।

बातो बातों में झगड़ा हो गया। गजाधर ने कुछ कठोर बाते कही। अन्त को सुमन ने अपनी हँसुली गिरवी रखने को दी और गजाधर भुनभुनाता हुआ लेकर चला गया।

लेकिन सुमन का जीवन सुख में कटा था। उसे अच्छा खाने, अच्छा पहिनने की आदत थी। अपने द्वार पर खोमचे वालो की आवाज सुनकर उससे रहा न जाता। अबतक वह गजाधर को भी खिलाती थी। अब से अकेली ही खा जाती। जिह्वा रस भोग के लिए पति से कपट करने लगी।

धीरे-धीरे सुमन के सौन्दर्य की चर्चा मुहल्ले मे फैली। पास-पड़ोस की स्त्रियाँ आने लगी। सुमन उन्हें नीच दृष्टि से देखती; उनसे खुलकर न मिलती। पर उसके रीति व्यवहार में वह गुण था जो ऊँचे कुलो में स्वाभाविक होता है। पड़ोसिनो ने शीघ्र ही उसका आधिपत्य स्वीकार कर लिया। सुमन उनके बीच में रानी मालूम होती थी। उसकी सगर्वा प्रकृति को इसमें अत्यन्त आनन्द प्राप्त होता था। वह उन स्त्रियों के सामने अपने गुणो को बढा कर दिखाती। वह अपने भाग्य को रोती, सुमन अपने भाग्य को सराहती। वे किसी की निन्दा करती तो सुमन उन्हें समझाती। वह उनके सामने रेशमी साडी़ पहनकर बैठती, जो वह मैके से लाई थी। रेशमी जाकट खूटीपर लटका देती। उनपर इस प्रदर्शन का प्रभाव सुमन की बात चीत से कही अधिक होता था। वह वस्त्राभूषण के विषय मे उसकी सम्मति को बड़ा महत्व देती। नये गहने बनवाती तो सुमन से सलाह लेती, साडियाँ लेतीं तो पहले सुमन को अवश्य दिखा लेती। सुमन ऊपर से उन्हें निष्काम भाव से सलाह देती, पर उसे मन में बड़ा दुःख होता। वह सोचती