पृष्ठ:सेवासदन.djvu/२४२

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सेवासदन २८१


यह अन्याय था या नहीं? और तुमने कैसे ऐसा घोर अन्याय होने दिया है। क्या तुम्हें एक अबला बालिका का जीवन नष्ट करते हुए तनिक भी दया न आई?

यदि शान्ता यहाँ न होती तो कदाचित् सदन अपने मन के भावों को प्रकट करने का साहस कर जाता। वह इस अन्याय को स्वीकार कर लेता। लेकिन शान्ता के सामने वह एकाएक अपनी हार मानने के लिए तैयार न हो सका। इसके साथ ही अपनी कुल मर्यादा की शरण लेते हुए भी उसे संकोच होता था। वह ऐसा कोई वाक्य मुंह से न निकालना चाहता था, जिससे शान्ता को दुख हो, न कोई ऐसी बात कह सकता था, जो झूठी आशा उत्पन्न करे। उसकी उड़ती हुई दृष्टि ने जो शान्तापर पड़ी थी, उसे बड़े संकट में डाल दिया था, उसकी दशा उस बालक की-सी थी, जो किसी मेहमान की लाई हुई मिठाई को ललचायी हुई आँखों से देखता है, लेकिन माता के भय से निकालकर खा नहीं सकता। बोला, बाईजी, आपने पहले ही मेरा मुँह बन्द कर दिया है, इसलिए मैं कैसे करें कि जो कुछ मेरे बड़ों ने किया, मैं उनके सिर दोष रखकर अपना गला नहीं छुड़ाना चाहता। उस समय लोक-लज्जा से से भी डरता था। इतना तो आप भी मानेगी कि संसार में रहकर संसार की चाल चलनी पड़ती है। मैं इस अन्याय को स्वीकार करता हूं। लेकिन यह अन्याय हमने नहीं किया, वरन् उस समाज ने किया है, जिसमें हम लोग रहते है।

सुमन—भैया, तुम पढ़े लिखे मनुष्य हो, मैं तुमसे बातों में नहीं जीत सकती, जो तुम्ह उचित जान पड़े वह करो। अन्याय अन्याय हो है, चाहे कोई एक आदमी करे या सारी जाति करे। दूसके भय से किसी पर अन्याय नहीं करना चाहिए। शान्ता यहाँ खड़ी है, इसलिए मैं उसके भेद नहीं खोलना चाहती, लेकिन इतना अवश्य करेंगी कि तुम्हें दूसरी जगह धन, सम्मान, रूप, गुण सब मिल जाय पर यह प्रेम न मिलेगा। अगर तुम्हारे जैसा इसका हृदय भी होता तो यह आज अपनी नई ससुराल में आनन्द से बैठी होती, लेकिन केवल तुम्हारे प्रेम नें उसे यहाँ खीचा।