पृष्ठ:सेवासदन.djvu/२५०

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सेवासदन २९१


निकाल कर उसकी ओर बढाये और बोला यह लो तमाखू पीना।

जीतन ने ऐसा मुंह बनाया, जैसे कोई वैष्णव मदिरा देखकर मुंह बनाता है, और बोला भैया, तुम्हारा दिया तो खाता ही हूं, यह कहाँ पचेगा?

सदन—नही नही मै खुशी से देता हूँ। ले लो, कोई हरज नही है।

जीतन-—नहीं भैया, यह न होगा, ऐसा करता तो अबतक चार पैसे का आदमी हो गया होता, नारायण तुम्हें बनाये रखें।

सदन को विश्वास हो गया कि यह बड़ा सच्चा आदमी है। इसके साथ अच्छा सलूक, करूँगा।

सन्ध्या समय सदन की नाव गंगा की लहरों पर इस भॉति चल रही थी जैसे आकाश में मेघ चलते हैं। लेकिन उसके चेहरे पर आनन्द-विकास की जगह भविष्य की शंका झलक रही थी, जैसे कोई विद्यार्थी परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद चिन्ता में ग्रस्त हो जाता है। उसे अनुभव होता है कि वह बांध जो संसाररूपी नदी की बाढ़ से मुझे बचाये हुए था, टूट गया है और में अथाह सागर में खडा हूँ। सदन सोच रहा था कि मैंने नाव तो नदी में डाल दी, लेकिन यह पार भी लगेगी? उसे अब मालूम हो रहा था कि वह पानी गहरा है, वहा तेज है और जीवनयात्रा इतनी सरल नही है, जितनी मैं समझता था। लहर यदि मीठे स्वरों में गाती है तो भयंकर ध्वनि से गरजती भी है, हवा अगर लहरों को थपकियां देती है, तो कभी कभी उन्हे उछाल भी देती है।

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प्रभाकरराव का क्रोध बहुत कुछ तो सदनके लेखों से ही शांत हो गया था और जब पद्मसिह ने सदन के आग्रह से सुमन का पूरा वृतान्त उसे लिख भेजा,तो वह सावधान हो गए।

म्युनिसिपैलिटी में प्रस्ताव को पास हुए लगभग तीन मास बीत गये; पर उसकी तरमीम के विषय में तेगअली ने जो शंकाएँ प्रकट की थी वह निर्मल प्रतीत हुई। न दालमण्डी के कोठों पर दुकाने ही सजी और न वेश्याओें ने निकाह-बंधन से ही कोई विशेष प्रेम प्रकट किया। हाँ, कई