पृष्ठ:सेवासदन.djvu/२६१

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ प्रमाणित हो गया।
३०८
सेवासदन
 

सदन——नही चाचा, आप मेरी यह प्रार्थना स्वीकार कीजिये; मैं बहुत मजबूर होकर आपसे यह कह रहा हूँ।

शर्मा——ऐसी क्या बात है जो तुम्हे मजबूर करती है? तुम्हें जो संकोच हो वह साफ साफ क्यो नही कहते?

सदन——मेरे इस घरमे रहनेसे आपकी बदनामी होगी। मैने अब अपने उस कर्तव्य के पालन करनेका संकल्प कर लिया हूँ, जिसे में कुछ दिनों तक अपने अज्ञान और कुछ समयतक अपनी कायरता और निन्दा के भयसे टालता आता था। में आपका लड़का हूं। जब मुझे कोई कष्ट होगा,आपका आश्रय लूँगा, कोई जरूरत पड़ेगी तो आपको सुनाऊँगा, लेकिन रहूँगा अलग अीर मुझे विश्वास है कि आप मेरे प्रस्ताव को पसन्द करेंगे।

विट्ठलदास भी बातकी तहतक पहुँच गये। पूछा,कल सुमन और शान्तासे तो तुम्हारी मुलाकात नही हुई ?

सदनके चेहरे पर लज्जा की लालिमा छा गई,जैसे किसी रमणी के मूखपरसे घूँघट हट जाय। दबी जबान से बोला, जी हाँ।

पद्मसिंह बडे धर्म संकट में पड़े। न ‘हां’ कह सकते थे, न ‘नही' कहते बनता था। अबतक वह शान्ता के सम्बन्ध में अपने को निदोष समझते थे। उन्होने इस अन्याय का सारा भार अपने भाईके सिर डाल दिया था और सदन तो उनके विचार में काठ का पुतला था। लेकिन अब इस जाल मे फंसकर वह भाग निकलने की चेष्टा करते थे। संसार का भय तो उन्हे नही था, भय था कि कही भैया यह न समझ ले कि यह सब मेरे सहारे से हुआ है, मैने ही सदन को बिगाडा हूँ। कही यह सन्देह उनके मन में उत्पन्न हो गया तो फिर वह कभी मुझे क्षमा न करेगें।

पद्मसिंह कई मिनट तक इसी उलझन में पडे रहे। अन्त में वह बोले, सदन, यह समस्या इतनी कठिन है कि मैं अपने भरोसे पर कुछ नही कर सकता। मैया की राय लिए बिना 'हाँ' या 'नही’ कैसे कहूँ? तुम मेरे सिद्धान्त को जानते हो। मैं तुम्हारी प्रशंसा करता हूँ और प्रसन्न हूं कि ईश्वर ने तुम्हें सद्बुद्धि दी। लेकिन मै भाई साहबकी इच्छा को सर्वोपरि