पृष्ठ:सेवासदन.djvu/२६६

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सेवासदन ३१५

पद्म--इसकी क्या जरूरत है? मैं तो वहाँ हूँ ही मेरे देखते उसे किसी बातकी तकलीफ न होने पावेगी।

भामा--नही भैया, लेते जाओ, क्या हुआ। इस हॉड़ी में थोडा सा घी है, यह भी भेजवा देना । बाजारू घी घरके घीको कहाँ पाता है, न वह सुगन्ध न वह स्वाद। उसे अमावट की चटनी बहुत अच्छी लगती है, मै थोड़ी सी अमावट भी रखे देती हूँ। मीठे-मीठे आम चुनकर रस निकाला था। समझाकर कह देना, बेटा, कोई चिन्ता मत करो। जबतक तुम्हारी माँ जीती है, तुमको कोई कष्ट न होने पावेगा। मेरे तो वही एक अन्धे की लकड़ी है। अच्छा है तो, बुरा है तो, अपना ही है। संसारकी लाज से आँखो से चाहे दूर कर दूं, लेकिन मन से थोड़े ही दूर कर सकती हूं।

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जैसे सुन्दर भाव के समावेश से कविता में जान पड़ जाती है और सुन्दर रंगो से चित्रों में उसी प्रकार दोनों बहनो के आने से झोपड़े में जान आ गई है। अन्धी आँखों में पुतलियाँ पड़ गई है।

मुरझायी हुई कली शान्ता अब खिलकर अनुपम शोभा दिखा रही है। सूखी हुई नदी उमड़ पडी है। जैसे जेठ वैसाख की तपन की मारी हुई गाय सावन में निखर जाती है और खेतों में किलोलें करने लगती है, उसी प्रकार विरह की सताई हुई रमणी अब निखर गई है, प्रेम में मग्न है ।

नित्यप्रति प्रातःकाल इस झोपडे से दो तारे निकलते है और जाकर गंगा में डूब जाते है? उनमें से एक बहुत दिव्य और द्रुतगामी है, दूसरा मध्यम और मन्द। एक नदी में थिरकता है, नाचता है, दूसरा अपने वृत्त से बाहर नहीं निकलता। प्रभात की सुनहरी किरणों मे इन तारों का प्रकाश मन्द नही होता, वे और भी जममगा उठते हैं।

शान्ता गाती है, सुमन खाना पकाती है, शान्ता अपने केशों को सँवारती है, सुमन कपड़े सीती है, शान्ता भूखे मनुष्य के समान भोजन के थालपरट्ट पड़ती है. सुमन किसी रोगीके सदृश सोचती है कि मैं अच्छी हूँगी या नहीं।