पृष्ठ:सेवासदन.djvu/२८८

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ जाँच लिया गया।
सेवासदन २४१

हैं जो उससे कही अधिक कष्ट झेलकर भी अपनी आत्माकी रक्षा करती है? दमयन्ती पर कैसे-कैसे दु:ख पडे, सीताको रामचन्द्र ने घरसे निकाल दिया और वह बरसो जंगलोमें नाना प्रकारके क्लेष उठाती रही, सावित्रीने कैसे-कैसे दुःख सहे पर वह धर्मपर दृढ रही। उतनी, दूर क्यो जाऊँ-मेरे ही पड़ोसमे कितनी स्त्रियाँ रो-रोकर दिन काट रही थी। अमोला- मे वह बेचारी अहिरिन कैसी विपित्ति झेल रही थी। उसका पतिपरदेशसे बरसों न आता था, बेचारी उपवास करके पड़ी रहती थी।हाय, इसी सुन्दरताने मेरी मिट्टी खराब की। मेरे सौदर्यक अभिमाननेमुझे यह दिन दिखाया।

हा प्रभो! तुम सुन्दरता देकर मनको चचल वयो बना देते हो? मैने सुन्दर स्त्रियों को प्राय: चंचल ही पाया। कदाचित् ईश्वर इस युक्ति से हमारी आत्मा की परीक्षा करते है, अथवा जीवन-मार्गमे सुन्दरतारूपी बाधा डालकर हमारी आत्मा को बलवान, पुष्ट बनाना चाहते है।सुन्दरतारूपी आगमे आत्माको डालकर उसे चमकाना चाहते है। पर हा! अज्ञानवश हमें कुछ नही सूझता, यह आग हमे जला डालती ह, यह बाधा हमे विचलित कर देती है!

यह कैसे बन्द हो, न जाने किस चीज का काँटा था। जो कोई आके मुझे पकड ले तो यहाँ चिलाऊँगी तो कौन सुनेगा? कुछ नही, यह न विलास प्रेमका दोष हैं, न सुन्दरता का दोष है, यह सब मेरे अज्ञानका दोष है। भगवन्। मुझे ज्ञान दो। तुम्ही अब मेरा उद्धार कर सकते हो। मैने भूल की कि विधवाश्रम में गई। सदन के साथ रहकर भी मैने भूल की। मनुष्यों से अपने उद्धार की आशा रखना व्यर्थ है। ये आापही मेरी तरह अज्ञानता में पडे हुए है। ये मेरा उद्धार क्या करेगे? मै उसीकी शरणमे जाऊँगी ।लेकिन कैसे जाऊँ? कौन-सा मार्ग हे, दो सालसे धर्मग्रन्थों को पढ़ती हूं, पर कुछ समझमे नही आता। ईश्वर, तुम्हे कैसे पाऊँ? मुझे इस अन्धकारसे निकालो। तुम दिव्य हो, ज्ञानमय हो, तुम्हारे प्रकाशमे संभव है यह अन्धकार विच्छिन्न हो जाय। यह पत्तियाँ