पृष्ठ:सेवासदन.djvu/६६

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सेवासदन
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हाँ, प्रातःकाल थोडी-सी कसरत कर लिया करता था । इसका उसे व्यसन था । अपने गाँवमें उसने एक छोटा-सा अखाड़ा बनवा रखा था । यहाँ अखाडा तो न था, कमरे ही में डंड कर लेता। शामको शर्माजी उसके लिए फिटिन तैयार करा देते । तब सदन अपना सूट पहनकर गर्व के साथ फिटिन पर सैर करने निकलता । शर्माजी पैदल घूमा करते थे ।वे पाक या छावनी की ओर जाते, किन्तु सदन उस तरफ न जाता । वायुसेवन में जो एक प्रकार का दार्शनिक आनन्द होता है उसका उसे क्या ज्ञान ! शुद्ध वायुको सुखद शीतलता, हरे भरे मैदानों की विचारोत्पादक निर्जनता और सुरम्य दृश्यों की आनन्दमयी निस्तब्धता उसमे इनके रसास्वादन की योग्यता न थी । उसका यौवनकाल था, जब बनाव-सिंगार का भूत सिरपर सवार रहता है । वह अत्यन्त रूपवान, सुगठित, बलिष्ठ युवक था। देहात में रहा, न पढ़ना, न लिखना, न मास्टरका भय न परीक्षा की चिन्ता, सेरों दूध पीता था। घरकी भैसें थीं, घी के लोदे के लोदे उठाकर खा जाता। उसपर कसरत का शौक । शरीर बहुत सुडौल निकल आया था ।छाती चौड़ी, गरदन तनी हुई, ऐसा जान पड़ता था, मानो देह में ईगूर भरा हुआ है । उसके चेहरे पर वह गम्भीरता और कोमलता न थी जो शिक्षा और ज्ञान से उत्पन्न होती है । उसके मुखसे वीरता और इण्डता झलकती थी आंखें मतवाली, सतेज और चञ्चल थी । वह वाग का कलमी पौधा नही, वन का सुदृढ वृक्ष था। निर्जन पार्क या मैदान में उसपर किसकी निगाह पड़ती है कौन उसके रूप और यौवन को देखता ! इसलिए वह कभी दालमंडी की तरफ जाता, कभी चौक की तरफ ! उसके रंगरूप ठाटबाट पर बूढ़े जवान सबकी आंखें उठ जाती । युवक उसे ईर्षा से देखते, बूढ़े स्नेह से । लोग राह चलतेचलते उसे एक आँख देखने के लिए ठिठक जाते| दूकानदार समझते कि यह किसी रईसका लडका है ।

इन दुकानोंके ऊपर सौन्दर्यका बाजार था। सदन को देखते ही उस बाजारमें एक हलचल मच जाती । वेश्याएँ छज्जों पर आ आकर खड़ी होजाती और प्रेमकटाक्ष के वाण उसपर चलातीं । देखें यह बहका हुआ कबूतर