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सेवासदन
 


किस छतरीपर उतरता है? यह सोनेकी चिडिया किस जालमे फंसती है? सदन में वह विवेक तो नही था जो सदाचार की रक्षा करता है। उसमें वह आत्म-सम्मान भी नही था जो आँखो को ऊपर नही उठने देता। उसकी फिटन बाजार में बहुत धीर-धीरे चलती। सदन की आँखे उन्ही रमणियों की ओर लगी रहती। यौवन के पूर्वजाल में हम अपनी कुवासनाओं के प्रदर्शन पर गर्व करते है, उत्तर काल अपने सद्गुणों प्रदर्शन पर। सदन अपने को रसिया दिखाना चाहता था, प्रेम से अधिक बदनामी का आकांक्षी था। इस समय यदि उसका कोई अभिन्न मित्र होता तो सदन उससे अपने कल्पित दुष्प्रेम की विस्तृत कथाएँ वर्णन करता।

धीरे-धीरे सदन के चित्त की चंचलता यहाँ तक बढ़ी कि पढ़ना लिखना सब छूट गया। मास्टर आते और पढाकर चले जाते। लेकिन सदन को उनका आाना बहुत बुरा मालूम होता। उसका मन हर घडी बाजार की ओर लगा रहता, वही दृश्य आँखों में फिरा करते, रमणियो के हाव-भाव ओर मृदु मुस्कान के स्मरण में मग्न रहता। इस भाँति दिन काटने के बाद ज्यों ही शाम होती वह बनठन कर दालमंडी की ओर निकल जाता। अन्त में मन को इस कुप्रवृति का बही फल हुआ जो सदैव हुआ करता है तीन ही चार मास में उसका संकोच उड़ गया। फिटिन पर दो आदमी दूतों की तरह उसके सिरपर सवार रहते। इसलिए वह इस वाग के फूलो में हाथ लगाने का साहस न कर सकता था। वह सोचने लगा कि किसी भांति इन दूतों से गला छुडाऊँ। सोचते सोचते उसे एक उपाय सूझ गया। एक दिन उसने शर्माजी से कहा चचा, मुझे एक अच्छा सा घोडा ले दोजिये। फिटिन पर अपाहिजों की तरह बैठे रहना कुछ अच्छा नही मालूम होता। घोडेपर सवार होने से कसरत भी हो जायगी और मुझे सवारी का भी अभ्यास हो जायगा।

जिस दिन से सुमन गई थी शर्माजी कुछ चिन्तातुर रहा करते थे। मुवक्किल लोग कहते कि आजकल इन्हें न जाने क्या हो गया है बात बात पर झुझला जाते है। हमारी बात ही न सुनेंगे तो वह क्या करेंगे।