पृष्ठ:सेवासदन.djvu/८४

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ जाँच लिया गया।
९९
सेवासदन
 

जाने का साहस नहीं होता। अपनी प्रबल आकांक्षा को हृदय में छिपाये वह नित्य इसी तरह निराश होकर लौट जाता है । लेकिन आज उसने मुलाकात करने का निश्चय कर लिया है, चाहे कितनी देर क्यों न हो जाय । विरह का दाह अब उससे नही सहा जाता । वह सुमन के कोठे के सामने पहुंचा । श्यामकल्याण की मधुर ध्वनि आ रही थी। आगे बढा और दो घंटे तक पार्क और मैदान में चक्कर लगाकर नौ बजे फिर दालमंडी की ओर चला ।

आश्विन के चन्द्र की उज्ज्वल किरणों न दालमंडी की ऊँची छतों पर रुपहली चादर-सी बिछा दी थी । वह फिर सुमनके कोठे सामने रुका। संगीत ध्वनि बन्द थी, कुछ बोलचाल न सुनाई दी । निश्चय हो गया कि कोई नही है । घोडे से उतरा उसे नीचे की दूकान के एक खम्भे से बॉध दिया और सुमन के द्वार पर खड़ा हो गया । उसकी सॉस बड़े वेग से चल रही थी और छाती जोरसे धड़क रही थी ।

सुमन का मुजरा अभी समाप्त हुआ था, और उसके मन पर वह शिथिलता छाई हुई थी जो आँधी के पीछे आनेवाले सन्नाटे के समान आमोद-प्रमोद का प्रतिफल हुआ करती है । यह एक प्रकार की चेतावनी होती है जो आत्मा की ओर से भोगविलास में लिप्त मन को मिलती है । इस दशा में हमारा हृदय पुरानी स्मृतियों का क्रीड़ा क्षेत्र बन जाया करता है । थोडी देर के लिए हमारे ज्ञानचक्षु खुल जाते है । सुमन का ध्यान इस समय सुभद्रा की ओर लगा हुआ था। वह मन उससे अपनी तुलना कर रही थी । जो शान्तिमय सुख उसे प्राप्त है, क्या वह मुझे मिल सकता है ? असभव ! यह तृष्णासागर है, यहाँ शान्तिसुख कहाँ ? जब पद्मसिंह के कचहरी से आनेका समय होता तो सुभद्रा कितनी उल्लसित होकर पान के वीड़े लगाती थी, ताजा हलवा पकाती थी। जब वह घर आते थे तो वह कैसी प्रेम विह्वल होकर उनसे मिलने दौड़ती थी। आह! मैंने उनका प्रेमालिंगन भी देखा है कितना भाव समय में कितना सच्चा । मुझे वह सुख कहाँ ? यहाँ तो अन्धे आते है , या बातों के बीर । कोई अपने धन का जाल बिछाता है, कोई अपनी चिकनी चुपडी बातो का। उनके हृदय भावशून्य, शुष्क ओर ओछेपन से भरे हुए होते है ।