पृष्ठ:सेवासदन.djvu/९

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सेवासदन
 


दुश्मन हूँ, लेकिन करूँ क्या, अभी पिछले साल लडकी का विवाह किया, दो हजार रुपये केवल दहेज में देने पड़े, दो हजार और खाने-पीने में खर्च पड़े, आप ही कहिये, यह कमी कैसे पूरी हो ?

दूसरे महाशय इनसे अधिक नीतिकुशल थे । बोले, दारोगा जी, मैने लडके को पाला है, सहस्त्रो रुपये उसकी पढ़ाई मे खर्च किये है । आपकी लड़की को इससे उतना ही लाभ होगा जितना मेरे लड़के को । तो आप ही न्याय कीजिये कि यह सारा भार मैं अकेले कैसे उठा सकता हूँँ ?

कृष्णचन्द्र को अपनी ईमानदारी और सचाई पर पश्चात्ताप होने लगा। अपनी निःस्पृहता पर उन्हें जो घमण्ड था वह टूट गया। वह सोच रहे थे कि यदि मैं पाप से न डरता तो आज मुझे यो ठोकरे न खानी पड़ती। इस समय दोनों स्त्री-पुरुष चिन्ता में डूबे बैठे थे, बड़ी देर के बाद कृष्णचन्द्र बोले, देख लिया, ससार में सन्मार्ग पर चलने का यह फल होता है । यदि आज मैंने लोगो को लूट कर अपना घर भर लिया होता तो लोग मुझसे सम्बन्ध करना अपना सौभाग्य समझते ; नही तो कोई सीधे मुंह बात नही करता है। परमात्मा के दरबार में यह न्याय होता है। अब दो ही उपाय है, या तो सुमन को किसी कगाल के पल्ले वाधू दू या कोई सोने की चिड़िया फँसाऊँ । पहली बात तो होने से रही; बस अब सोने की चिड़िया की खोज में निकलता हूँँ। धर्म का मजा चख लिया, सुनीति का हाल भी देख चुका। अब लोगो के के खूब गले दबाऊँगा, खूब रिश्वतें लूगा, यही अन्तिम उपाय है । संसार यही चाहता है, और कदाचित ईश्वर भी यही चाहता है, यही सही । आज से मैं भी वही करूँगा जो सब लोग करते हैं ।

गंगाजली सिर झुकाये अपने पति की ये बाते सुन कर दुःखित हो रही थी। वह चुप थी, आंखों में आँँसू भरे हुए थे।