पृष्ठ:स्टालिन.djvu/१०७

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[एक सौ था। १९२३ में स्टालिन तथा जिनोवीफ आदि ने ट्रॉट्स्की पर यह आरोप लगाया कि वह नयों का सहारा लेकर पुरानों को हटाना चाहता है। किन्तु लेनिन ने इन लोगों का मेल करा दिया। तो भी लेनिन के रोग शय्या पर पड़ते ही लोगों ने फिर ट्रास्की को बदनाम करना प्रारम्भ किया। परिणाम यह हुआ कि २१ जनवरी १६२४ को लेनिन का देहांत होने पर ट्रॉट्स्की ने वसीयतनामे के शब्दों के प्रतिवाद स्वरूप लेनिन के अंत्येष्टि संस्कार में सम्मिलित होने से इंकार कर दिया। वास्तव में ट्राटस्की ने अपनी जीवनी में सब से बड़ी भूल यही की। बण्ड रसेल ने अपने ग्रंथ में लिखा है कि यदि जर्मन सेनापति लेनिन को बन्द गाड़ी में छिपा कर जर्मनी में से निकाल कर रूस न पहुंचाता तो रूस में क्रांति न होती । यदि ट्रॉद्स्की क्रोध के वशीभूत होकर लेनिन के अंत्येष्टि संस्कार में सम्मिलित होने से निपेध न कर देता तो सोवियट में पंचवर्षीय योजना संभवतः कभी न बनाई जाती । यदि आस्ट्रियन पानिमेंट को वोट के आड़े समय में एक समाजवादी सदस्य स्नानागार में न चला जावा तो डाल्फस वहां का चांसलर न बनता । उसी प्रकार यदि मुसोलिनी अपने बाल्य जीवन में स्वीज़लैंण्ड में जाकर कष्ट न उठाता तो इटली की दशा किसी और ही प्रकार की होती।" अब स्टालिन और उसके गुट ने टॉस्की को बुरी तरह से बदनाम करना प्रारम्भ किया। अन्त में ट्रॉट्स्की को १९२५ में परराष्ट्र विभाग से प्रस्तीफा देकर काकेशिया में नजर बन्द होना पड़ा। कुछ दिनों बाद उसको वहां से फिर बुलाकर एक साधारण पद पर रखा गया। किन्तु १९२७ में उसका फिर टर्कीको निर्वासित कर दिया गया। अबकी बार उसको अपने देश को