पृष्ठ:स्त्रियों की पराधीनता.djvu/१५

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पति के स्वर्गवासी होने पर स्त्री सह-गमन अर्थात् आग में जल कर प्राण त्याग करे। 'मृतेभर्तरि या नारी समारोह हुताशनम्' तथा 'शुभाचारा वर्गलोके महीयते*[१]' आदि। स्त्री के सहगमन का फल क्या है? यदि पुरुष महा पातकी हो और हत्या आदि दोषों से भी युक्त हो तो स्त्री के सहगमन करने से वह उन दोषों से मुक्त होकर स्वर्गगामी होगा†[२]। शास्त्रों ने दया करके गर्भवती, रजस्वला, बालिका और बच्चेको दूध पिलाने वाली स्त्रियों को सतीपन के बन्धन से मुक्त किया है‡[३]

मुग़ल-सम्राट अकबर के समय से इस सती प्रथा के बन्द करने का प्रयास किया गया था। किन्तु§[४] प्रायः सभी देशों में यह प्रथा जैसे-तैसे प्रचलित||[५] रही। अँगरेजी राज्य के प्रारम्भ काल ही से इस प्रथा की ओर विशेष लक्ष्य दिया गया।


  1. *-दक्ष-संहिता, अ॰ ४ श्लो॰ १९। श्रीयुत मन्मथनाथदत्त का धर्मशास्त्र-(१९०८ ई॰)
  2. †-विवादमगार्णव में इसका पूर्ण समर्थन है। इस ग्रन्थ का अंगरेजी अनुवाद कोलब्रुक साहब ने किया है। सम्पूर्ण ग्रन्थ तीन भागों में विभक्त है। इसका नाम "कोलब्रुक्स डायजेृस" है।
  3. ‡-कोल॰ डाय॰ भा॰ २, पृ॰ ४५१।
  4. §-कोल॰ डाय॰ भा॰ २, पृ॰ ४५६-४५७।
  5. ||. Steel's Hindoo Law and Custom (1868) page 174. again-Cranfurd's Sketches of the Hindoos (1792) Vol. 2nd. page 17-33