पृष्ठ:स्त्रियों की पराधीनता.djvu/२२

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ जाँच लिया गया।
१/



वाच्योमातु रक्षिता*।" यदि पुत्र न हो या छोटा हो तो श्वसुरग्रह या पिटग्रह में रहना चाहिए; किन्तु स्वाधीन कभी न रहना चाहिए। यदि पति का ऐसा कोई निकट सम्बन्धी न हो तो "तेषामभाव ज्ञातयः" + यदि वे भी न हो तो देश का रक्षक (राजा) उनका पालन करे । हिन्दू विधवा और विशेषतः विकेशा को न्यायालय में साक्षी देने न जाना होगा।

यह तो हिन्दू विधवा को निजू दशा के विषय में हुआ, अब सम्पत्ति से उसके सम्बन्ध में हिन्दू-शास्त्र जो कुछ आज्ञा देते हैं उसका भी ज़रा दिग्दर्शन कर लेना अनुचित न होगा। हमारे शास्त्रों ने विधवा के लिए सम्पत्ति के इस प्रकार भाग किये हैं :-(१) पति की सम्पत्ति पर विधवा का हक, (अ) वारिस, (ब) हिस्सा, (क) दत्तक, (च) अन्नवस्त्र, (२) सम्पत्ति का उपभोग, और (३) मृत्युके अनन्तर उस सम्पत्ति का विभाग। पति को उत्तर क्रिया और श्राद्ध का अधिकार पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, दत्तक और विधवा को क्रम से है !!


  • -मनु० अ०९, श्लो०५।

†-"न स्त्रीखातन्वामहर्ति" "खातन्वा न कचित् स्त्रियः" "न भजेत् स्त्री स्वातन्त्रा"।

+-याज्ञवल्का, अ०१ श्लो० ८५।

ş-Sir T. Strange's Hindoo Law (1830) Vol. 2nd page 482.

॥-निर्णयसिन्धु के मतानुसार उत्तर क्रिया का हक पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, और दत्तक की है, इन चारों के न होने पर विधवा की है।