हम जद भी गतिचलित हो गये, उरा तेरे गतिमय नतन से, अवदा डुला तब ताण्डव-गति रोअचल राष्ट्र-निद्रा गिरि-मन्दर, अरे भयकर, ओ शिवशार। हम नाचे तो, पिन्तु हो गये, पेय, बहुत कुछ हम वे ताले, तय ताण्डव-पति-गति कोमने, विवृत पार दिया था, हाशिधर, गरे भयकर, जो प्रलयकर । तु मति दाता, तू ति दाता, गति दाता तू औषड दानो, अब निति निगति दाता चन प्रबाट रहा है तू, हे नटयर, अरे भयर, ओ प्रलयकर । जब जग-जन की आसो म तू बन जाता है अगति अति मय, तभी रद्र गतिमय होता है तेरा अति गभीर अतर-सर, अरे भयबार, ओ प्रलपार । नाचा स्चय, नचाया सब को, और समेटी हैं अब लोला, 'ठहरो"-यो कहकर तू गुप चुप नाच रहा है स्थय ताल पर, अरे मयकार, ओ शिवयकर। अपना नाच अप मानेगा ? क्या न नचायेगा पर हमसे। भर दे रे, तू इसी अगति मिस, भर दे गति हिम में विश्वम्भर, अरे भयवर, भो शिवशकर। हा फूह । हम पैसे नाचै तेरो सुघड ताउ-नि-पति पर टू ही सदा नाचता रह, रे, एकाको मैग्द नटनार, अरे भयकर, जो प्रलमार तेरे रक्त निन्दु, श्रम-कण वग, झलक रह हैं नत्र या पर, उसो स्वेद-कण दर्पण म हम निर मुट गए अरै भयकर, 4 fTREE) श्री गणेश युटोर, कानपुर ८ अप्रैक १९३४ हम निवपाया उनम
पृष्ठ:हम विषपायी जनम के.pdf/४५०
दिखावट