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पृष्ठ:हम विषपायी जनम के.pdf/४७१

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अनल गीत सुन ले, ओ यौवन के मदमाते वीर वली, अग्नि गीत को यह स्वर-लहरी अन्तरिक्ष को चौर चली, तारक माला-सो स्फुलिंग स्थर श्रुतिया राव दिशि फैल रहीं, अनल-बुमार, आज तू पावक स्वर-सरग से खेल यही, आज अग्नि - सस्कारो की तू हो जाने दे रस्म, सम्वे, अग - जग को जडता • चचलता हो जाने दे मस्म, सखे । स्वर-सप्तक कुछ नहीं, साल-यत्ति गति को भस्मीभूत किये,- निपट अटपटी विकट तान से चिनगारियां प्रसूत किये- अरे, चला चल सर्व दहन का पदयानर-सन्देश लिय, आज लुकाठी की बीणा ले चल, दाहक का वेश किये, अग्निममी ही नहीं, अनल-गम्भूता हो वीणा सेरी। अरे क्रान्तिदर्शी, उठ भाये अग्नि-शिखा, अब यया देरी? नू नारा बनियो का गायक, तू विकगल क्रान्ति द्रष्टा, तू विद्रोह रूप प्रलयकार, तू है अनल-राग सृष्टा, तेरे प्राणो मे तडपन है, नोच भावना अब कसी। यह विश्वासघात अर कैसा दुष्कृनिया क्यो, अब ऐसी कर दे क्षारक्षार अपनी इन प्राणमोहनी कृतियो को, खण्ड खण्ट कर दे, रे मोही, निज दुचर सस्मृतियो को। वितनी सदियों से लादे है तू उर पर यह भार वडा अरे, तनिक तो यता किसे तेरा यह गबिचार बढा? जीवन-वन्दुक ठुकराने वा त् ने स्वाग भरा, क्यो रे । रच यता तो, किन गलियों में अब तक तू विचरा यो, रे? अन उठ, आज जला दे सत्वर निज व्यक्तित्व, मोह, ममता, माग अलाम से भौषकि तुझको मिले ज्वलित पावफा शामता) दम विएपाय। जनम ५४२