ना जानें किस किस गत युग की सुध बुध ये अपने संग लायी। अब तो मम निस्तार निहित है केवल आत्म-विसर्जन में, प्रिय, दे दो अब अमित हलाहल इस माटी के भाजन में। सोचा था अमृतत्य हंसेगा मेरी रज के कण-कण मे, समझा था रस - रास रचेगा मग सूने वृन्दावन में, पर, तुम बोले कहाँ बमौरस तेरा भाग्य सदा का नीरस । घन गरजें या फुहिमा बरसें, तेरा नहीं चलेगा कुछ बस । सन कहते हो, सजन, रिक्तता ही है मेरे भाजन में तुम क्यो देने लगे अमीरस इस धन-गर्जन के क्षण में? हिस्ट्रिक्ट जेल, जनाव ९ अप्रैल १९४३ विहस उठो प्रियतम तुम मेरे सन्च्या नभ में विहंस उठो, प्रियतम, तुम, अगिता स्मिति छिटका दो, मेरे निगमागम, तुम । शान्त हुई दिन की वह सनन-सनन शीत पवन, घुमड रहे हिय-नभ में मम सचित मौन स्तवन, भूपुर की रुन झुन से भर दो मम-शून्य-श्रवण, आमओ, इस सन्ध्या में पग धरते थम थम तुम, मेरे इस तम पथ मे विहस उठो प्रियतम, तुम 1 इम विपरायी जनश के ५५'
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