याचा पथे 1 यदि तुम कभी करो याना म अनुभव रच थकान, तो, तुम अपने अनुगामी पर टिक रहना, हे प्राण, यही साथ है मेरी, मुझको और नहीं कुछ चाह, बस, मेरा सेवक के नाते, करो निवाह, सुजान तव नपुर, किकिणि-सिजन सम है मम अपण गान, है गुजरित तुम्हारे. मग मे जिनकी मकरुण तान, ये तव अनुचर गीत, बने है पन्थ पुर सर आज, बिखराते जाते है पथ मे स्वर-प्रसून स्मयमान ! कितनी लम्बी याना होगी मुझे न इसका भान, मुझको तो रखना है सतत तव सुविधा का ध्यान, पथ के कण्टक तुनते रहना, है यह भेरा काय, और चापना चरण तुम्हारे सब हो दिन अवसान । मुझे नहीं है तव तह-यानी होने का अभिमान, मैने तो पाया है भनुधर होने का वरदान, मिले तुम्हें कोई सगी, ता कर लेना स्वीकार, मे तो सतत रहूंगा हो तद अनुचर, ह रसखान । कभी कभी पीछे मुडकर तुम छिटकाना मुसकान, इतने ही से चमक उठेगा मम जीवन सुन-सान । यदि ऐसा हो, कि मैं पन्थ में ढक प, निम्मरण, तो तुम यह अवुलाना, रस यो, मेरा त निदान । रद्रीय कारागार, परली ८ अप्रल १९४ हम विपरायी जनमक
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