हम निज अभिशापो को गाथा का तक 'न-इति, न-इति' कह मायें। हम अपने को निपट अभागे, असफल जग, पाव तक महावे? आगे कभी मिलेंगे अपने । यो कह कर सका मन बहलावे? अब तक तो सह लिया बहुत कुछ, पर, अब धीरज छूट रहा है । जब यह नाता टूट रहा है। पर, क्यो छूटे अपनर धीरज ? यो नैराश्य हृदय में छाये ? सन्तत हो बनते रहते हैं अपने हिय - कण निपट पराये। भूल हमारी ही है जो हर अस्थिरता पर रीश लुभाये । उन पुराण पुरपा ने जग को चिर चचल क्या झूठ कहा है। लो, यह नाता टूट रहा है। जग मुंह मोटे, तो मुंह मोटे । यथा चिन्ता हम चिर एकाको । शिन्तु प्रार्थना है। न रच भी टूटे धारा हिय-भरणा की। जितनी लगे ठेस, उतनी ही हो निशारित चाह सेवा की। हमे निहार यह उठ जग-जन इनका नेह अटट रहा है। मद्यपि नाता टूट रहा है। आज पसार अधेड करो से अपचे फटे वस्य का अचल-- और उठा कर घोरे-धीरे ब्मथा भार से दवे दृगचल,- भीख मागत है हम पर दो चिर यरुणा का, अहो अचचल जग देखें कि आज सूखे में इक नव अपुर फूट रहा है यद्यपि माता टट रहा है रद्रीय कारागार, परतो ८ असूबर १९४३. विजय दशमा ! ) हम विपपाया जनम क १७९
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