पृष्ठ:हिंदी भाषा और उसके साहित्य का विकास.djvu/५९

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व्यवहार बन्द नहीं हो गया था, वरन चौदहवें शतक तक चलता रहा, और पन्द्रहवें शतक में भी उसमें पुस्तकें लिखी गई, चाहे उनकी संख्या कितनी ही अल्प क्यों न हो। यह मैं पहले लिख आया हूँ कि इस समय जितनी भाषायें भारतवर्ष में आर्य परिवार की बोली जाती हैं, वे प्रायः अपभ्रंश से ही विकसित हुई हैं, अब मैं उनका उल्लेख पृथक् पृथक् डा० जी० ए० ग्रियर्सन की सम्मति के अनुसार करता हूं। इधर जो आविष्कार हुए हैं, अथवा जो छानवीन की गई है, बाद को उनका उल्लेख भी करूगा ।

सिन्ध नदीके आस पास जो प्रदेश है, उसमें ब्राचड़ा नाम की अपभ्रंश भाषा प्रचलित थी, आधुनिक सिन्धी एवं लहँडा की उत्पत्ति उसी से हुई। कोहिस्तानी और काश्मीरी भापा जिस अपभ्रंश से निकली, यह पता नहीं, परन्तु ब्राचड़ा अपभ्रंश से वह अवश्य प्रभावित होगी।

दाक्षिणात्य प्रदेश में बोली जानेवाली भाषाओं का सम्वन्ध वैदर्भी और महाराष्ट्री अपभ्रंश से बतलाया जाता है, इसी प्रकार उत्कली अपभ्रंश उड़िया भाषा की जननी कही जाती है।

मागधी अपभ्रंश मगही आदि वर्त्तमान विहारी भापाओं का आधार है, यही मागधी बंगाल में पहुंच कर प्राच्या अथवा गौड़ी कहलाई, और उसी के अपभ्रंश से बंगला भाषा और आसामी की उत्पत्ति हुई। मागध अपभ्रंश का बड़ा विस्तृत रूप देखा जाता है, उत्कल अपभ्रंश भी उसी के प्रभाव से प्रभावित है, और पूर्व में ढक्की भाषा पर भी उसका अधिकार दृष्टिगत होता है। वह उत्तर दक्षिण और पूर्वमें ही नहीं बढ़ी, उसने पश्चिम में भी अपना विकास दिखलाया और अर्द्धमागधी कहलाई । कि जिसके अपभ्रंश ने अवधी, वघेलखण्डी, और छत्तीसगढ़ी को सृजन किया।

पश्चिमी भारत की वर्त्तमान भाषाओं का सम्बन्ध नागर अपभ्रंश से है, उसका एक रूप शौरसेनी है और दूसग आवन्ती। शौरसेनी का विस्तार पश्चिमी हिन्दी और पंजाबी में देखा जाता है। और आवन्ती का प्रभाव राजस्थानी और गुजराती में। कहा जाता है पंजाब से लेकर नेपाल तक के पहाड़ी प्रदेशों में जो भाषा इस समय बोली जाती है, उसका सम्बन्ध भी