पृष्ठ:हिंदी भाषा और उसके साहित्य का विकास.djvu/६०

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उज्जैन प्रान्त की आवन्ती भाषा के अपभ्रंश से ही है, क्योंकि राजस्थानो भाषाओं का जनक वही है, और राजस्थानी भाषाओं का ही अन्यतम रूप इन पहाड़ी भाषाओं में पाया जाता है।

श्रीयुत् डाक्टर सुनोतिकुमार चटर्जी महोदय इस अपभ्रंश भाषा के विषय में क्या कहते हैं, उसे भी सुनिये-*

"ईस्वी प्रथम सहस्र वर्षों के बीच में प्राचीन भारतवर्ष में एक नवीन राष्ट्र या साहित्यिक भाषा का उद्भव हुआ । यह अपभ्रंश भाषा थी, जो शौरसेनी प्राकृत का एक रूप थी। अपभ्रंश भाषा-अर्थात् यह शौरसेनी अपभ्रंश पंजाब से बंगाल तक और नैपाल से महाराष्ट्र तक साधारण शिष्टभाषा और साहित्यिक भाषा बनी। लगभग ईस्वी सन् ८०० से १३ या १४ सौ तक शौरसेनी अपभ्रंश का प्रचारकाल था। गुजरात और राजपुताने . के जैनों के द्वारा इस में एक बड़ा साहित्य बना। बंगाल के प्राचीन बौद्ध सिद्धाचार्यगण इसमें पद रचते थे, जो अन्नमें भोट (तिब्वती) भाषामें उल्था किये गये। इसके अतिरिक्त भारत में इस अपभ्रंश में एक विराट लोक- साहित्य बना। जिसके टूटे फूटे पद और गीत आदि हेमचन्द्र के प्राकृत व्याकरण और प्राकृत पिंगल और छन्दोग्रन्थ में पाये जाते हैं। शौरसेनी अपभ्रंश के प्रतिष्ठा के कई कारण थे । ईस्वी प्रथम सहस्रक की अन्तिम सदियों के राजपूत राजाओं की सभा में यह भाषा बोली जाती थी, क्योंकि यह भाषा उसी समय मध्यदेश और उसके संलग्न प्रान्तों में-आधुनिक पछांह में-सधारणतः घरेलू भापास्वरूप में इस्तेमाल होती थी। द्वितीय कारण यह है कि इस समय गोरखपंथी आदि अनेक हिन्दू समुदाय के गुरु लोग जो पंजाब और हिन्दुस्तान से नवजाग्रत हिन्दूधर्म की वाणी लेकर भारत के अन्य प्रदेश में गये, वे भी इसी भाषा को बोलते थे, इसमें पद आदि बनाते थे, और इसी में उपदेश देते थे। उसी समय उत्तर भारत के कन्नौजिया आदि ब्राह्मण बंगाल आदि प्रदेश में ब्राह्मण आचार और संस्कृति ले उपनिविष्ट हुये। इन सब कारणों से आज से लगभग एक हजार साल --

देखिये-विशाल भारत भाग ७ अंक ६ का पृष्ट ८४१