पृष्ठ:हिंदी भाषा और उसके साहित्य का विकास.djvu/६४

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स्वीकार नहीं करता। हिन्दू शब्द से हिन्दी का सम्बन्ध नहीं है, वरन् हिन्द शब्द उसका जनक है--हिन्द शब्द देशपरक है, और भारतवर्ष का पर्याय- वाची शब्द है। यदि हिन्दू शब्द से ही उसका सम्बन्ध माना जावे तो भी अप्रियता की कोई बात नहीं । आज दिन हिन्दू शब्दही इक्कीस करोड़ संख्या का सम्मिलन सूत्र है, यह नाम ही ब्राह्मण से लेकर अस्पृश्य जाति के पुरुष तक को एक बन्धन में बाँधता है । आर्य नाम उतना व्यापक नहीं है, जितना हिन्दूनाम, यह कभी विष रहा हो, पर अब अमृत है। वह पुण्य सलिला सुरसरी जल विधौत, सप्तपुरी पावन रजकगपूत और पुनीत वेद मंत्रों द्वारा अभिमंत्रित है क्या अब भी उसमें अपावनता मौजूद है। इतना निरा- करण के लिये कहा गया, इस विषय में मेग दूसरा सिद्धान्त है । यह सत्य है कि हमारे प्राचीन ग्रन्थों अथवा पुराणों में हिन्दू शब्द का प्रयोग नहीं है, यह सत्य है कि मेरुतंत्र का “हीनश्च दूषयत्वेव हिन्दुरित्युच्यते प्रिये" और शिव रहस्य का “हिन्दूधर्म प्रलोप्तारोभविष्यन्ति कलौयुगे" आधुनिक श्लोक खण्ड हैं। किन्तु यह भी सत्य है कि विजेता मुसल्मानों ने बलपूर्वक हिन्दुओं से हिन्दूनाम नहीं स्वीकार कराया। यदि वलात् यह नाम स्वीकार कराया गया होता, तो चन्दवरदाई ऐसा स्वधर्माभिमानी अब से सात सौ बरस पहले, अपने निम्न लिखित पद्य में हिन्दुवान, शब्द का प्रयोग न करता। वह लिखता है -

"हिन्दुवान रान भय भान मुखगहि य तेग चहुँ आन अब"

वास्तव बात यह है कि फ़ारस निवासी चिरकाल से भारत को हिन्द कहते आये हैं अब से लगभग पांच सहस्र वर्ष की पुरानी पुस्तक ज़िन्दाबस्ता में इस शब्द का प्रयोग पाया जाता है उसकी १६३वीं आयत यह है-

"चूं व्यास हिन्दी बलख आमद
गुस्तास्पज़रतुश्तरा बख्वाँद" "

यह हिन्द नाम सिन्धु के सम्बन्ध से पड़ा है, क्योंकि फ़ारसी में हमारा 'स' 'ह' हो जाता है, जैसे सप्त से हफ्त, असुर से अहुर, सोम से होम बना