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पृष्ठ:हिंदुई साहित्य का इतिहास.pdf/११०

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भूमिका
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जा सकता है, जिसे 'अन्दाज़' कहते हैं। इस प्रकार में, जिसे मीर ने स्वयं अपने लिए चुना है, तजनीस (Alliteration), तरसी' (Symmetry), दशबीह (Sïmîliîude), सफ़ाई गुफ़्त़गू (Belle diction), फ़साइत (Eloquence), बलागत (Elocution), अदा-बन्दी (Description), ख़ियाल (Imagination) आदि का प्रयोग अवश्य होना चाहिए। मीर का कहना है कि काव्य-कला के जो विशेषज्ञ हैं वे मैंने जो कुछ कहा है उसे पसन्द करेंगे। मैंने गँवारों के लिए नहीं लिखा; क्योंकि मैं जानता हूँ कि बातचीत का क्षेत्र व्यापक है, और मत विभिन्न होते हैं।'

जहाँ तक गय से संबंध है, उसके तीन प्रकार है १. वह जो 'मुरज्जज़' या काव्यात्मक गद्य (Poetic prose) कहा जाता है, जिसमें बिना तुक के लय होती है; २. जिसे 'मुसज्जा' या विकृत रूप में 'सजा' कहते हैं[]; ३. जिसे 'आरी' कहते हैं, जिसमें न तो तुक होती है और न छन्द। अन्तिम दो का सबसे अधिक प्रयोग होता है; कभी कभी ये दोनों मिला दिए जाते हैं। 'नज़्म' के, जो कविता के लिए प्रयुक्त सामान्य शब्द है, विपरीत गद्य को 'नस्त्र' कहते हैं। गद्य सामान्य हो तुकयुक्त हो, अधिकतर सामान्यतः पद्यों सहित होता है, तथा जो प्रायः उद्धरण होते हैं।

अब मैं, जैसा कि मैंने हिन्दुई के संबंध में किया है, निम्नलिखित अकारादिक्रम में हिन्दुस्तानी रचनाओं के विभिन्न प्रकारों के नामों पर विचार करता हूँ।

'इंशा' अर्थात्, 'उत्पत्ति'। यह हमारे पत्र-संबधी रिसाले से बहुत कुछ मिलता-जुलता पत्रों की भाँति लिखी गईं चीज़ों का संग्रह है। अनेक


  1. इस तुक-युक्त गद्य के तीन प्रकारों की गणना की जाती है। इस संबंध में "Rhétorique des nations musulmanes' (मुसलमान जातियों का काव्य-शास्त्र) पर मेरा चौथा लेख देखिए, भाग २२।