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पृष्ठ:हिंदू राज्यतंत्र.djvu/२४२

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( २११ ) करके वे गुप्तचर, गुप्त मंत्रणा और सैनिक बल की सहायता से एक दूसरे को दबाते हैं । (१३) जो अनेक गण अपना एक संघ बना लेते हैं, उनमें इन्हीं उपायों से विभेद या फूट उत्पन्न होती है। भिन्न या विभक्त हो जाने के कारण वे (अपने सार्वजनिक हित की ओर से) विमनस् या उदासीन हो जाते हैं; और अंत में भय के वशवर्ती होकर वे शत्रु के वश में हो जाते हैं। (१४) इस प्रकार विभेद उत्पन्न होने के कारण वे अवश्य विनष्ट होते हैं। अलग अलग हो जाने के कारण शत्रु सहज मे उन पर विजय प्राप्त कर लेते हैं । अतः गणों को सदा अपनी संघ- शक्ति को बनाए रखना चाहिए। (१५) संवात बल या सम्मिलित सेना के पौरुष से अर्थ की प्राप्ति होती है और बाहरी लोग भी संघात वृत्तिवालों से मैत्री करते हैं। (१६-१७) "अच्छे गणों मे सब परस्पर एक दूसरे की शुश्रूषा करते हैं जिससे ज्ञानवृद्ध उनकी प्रशंसा करते हैं। (एक दूसरे के साथ ) पूर्ण उत्तम रीति से व्यव- गणों की अच्छी बाते हार करते रहने के कारण अच्छे गण सब प्रकार का सुख प्राप्त करते हैं। जो उत्तम गण होते हैं, वे शास्त्र-सम्मत धर्मपूर्ण व्यवहार स्थापित करने से विवर्द्धित होते हैं और आपस में एक दूसरे के साथ अच्छा व्यवहार

-मिलाओ अर्थशास्त्र पृ० ३७६. संघाभिसंहतत्वादष्यान् परेषां

तानगुणान् भुजीत सामदामाभ्याम् । द्विगुणान् (विगुणान् पाठ होना चाहिए) भेददण्डाभ्याम् ।