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हिन्दी भाषा की उत्पत्ति।
पूर्वी हिन्दी

अर्द्धमागधी प्राकृत के अपभ्रंश से पूर्वी हिन्दी निकली है। जैन लोगों के प्रसिद्ध तीर्थङ्कर महावीर ने इस अर्द्धमागधी में अपने अनुगामियों को उपदेश दिया था। इसी से जैन लोग इस भाषा को बहुत पवित्र मानते हैं। उनके बहुत से ग्रन्थ इसी भाषा में हैं। तुलसीदास ने अपनी रामायण इस पूर्वी हिन्दी में लिखी है। इसके तीन भेद हैं। अथवा यों कहिए कि पूर्वी हिन्दी में तीन बोलियाँ शामिल हैं। अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी। इनमेंं से अवधी भाषा में बहुत कुछ लिखा गया है। मलिक महम्मद जायसी और तुलसीदास इस भाषा के सबसे अधिक प्रसिद्ध कवि हुए। जिसे ब्रज-भाषा कहते हैं उसका मुक़ाबला, कविता की अगर और किसी भाषा ने किया है तो अवधी ही ने किया है। रीवाँ दरबार के कुछ कवियों ने बघेली भाषा में भी पुस्तकें लिखी हैं; पर अवधी भाषा के पुस्तक-समूह के सामने वे दाल में नमक के बराबर भी नहीं हैं। छत्तीसगढ़ी में तो साहित्य का प्रायः अभाव ही समझना चाहिए।

पश्चिमी हिन्दी

पूर्वी हिन्दी तो मध्यवर्ती शाखा से निकली है अर्थात् बाहरी और भीतरी दोनों शाखाओं की भाषाओं के मेल से बनी है; पश्चिमी हिन्दी की बात जुदा है। वह भीतरी शाखा से सम्बन्ध रखती है और राजस्थानी, गुजराती और पंजाबी की बहन है। इस भाषा के कई भेद हैं। उनमें से हिन्दुस्तानी, व्रजभाषा,