पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/१५९

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....यस्तुमें स्पर्श नहीं है, इस कारण वे वायु नहीं हैं... पायु... शङ्करमिधने पायुफे लक्षण में लिखा है-"तर- दो प्रकारको है नित्य और अनित्य । यायवीय परमाणु । विशेष गुणसमानाधिकरण-विशेषगुण-समानाधिकरण-जातिमत्व नित्य और तदभिन्न यायु अनित्य है । अनित्य वायुसे भी वायुशक्षणम् ।" फिर तीन भेद है, शरीर, इन्द्रिय और विपथ वायुलोकस्य अर्थात् पदार्थको जिस जातिमें स्पर्शगुणके सिपा जीयोंको शरीरयायवीय है। ध्यजनवायु अङ्ग-सङ्गिजलके । अन्यान्य गुणों के असमानाधिकरणविशिष्ट विशेष गुणका शोतल स्पर्शको अभिव्यक्त करती है, त्यगिन्द्रिय भो स्पर्श. समानाधिकरणजातिमत्व विद्यमान है, यही यायु है। मानको ममिठपञ्चक है, मतपय यह वायवीय है। शरीर. महर्षि कणादने केवल स्पर्शगुण द्वारा ही वायुका लक्षण मौर इन्द्रियको छोड़ कर बाकी सभी वायुका साधारण | सिद्ध किया है। महर्षि कणादने घायुसाधनमकरणमें माम विषय है। जन्पद्रव्यमान हो पृथियो, जल, तेज । लिखा है-"स्पर्शच वायो" (ER) और पायुइन चार भूतोंसे थोड़ा बहुत सम्पन्ध रखता | शङ्करमिधने पैशेशिकसूत्रोपस्कार में लिखा है-"चका. है । तथा यह चार भूतोंके जन्यद्रष्यका आरम्मक या सम- यायिकारण है। रात् शब्दतिकमा समुच्चीयन्ते ।" .' शब्दके माधय थ्यका नामका आकाश है। शब्दमें अर्थात् "स्पर्शश्वं" शब्दके भन्समें जो "" कार 'एक मधिकरण या माय अवश्य है, वही आकाश कहा यह चकार समुश्चय पर्धाम व्ययहत हुमा है। इसमें लाता है। शम्दको उत्पत्ति के लिये वायुको अपेक्षा रहने । शम्द, धृति और कम इन तीनों को भी पायुलक्षणके पर भी यायुशका आश्रय नही है। क्योंकि, वायुका | अन्तभुक्त समझना होगा। शन्दस्पर्शवत् वेगवत् दण्या- पफ विशेष गुण स्पर्श है । यह स्पर्श यावद् द्रव्यभावो है। मिधातनिमित्तक है, शन्दसन्तति घायुका एक लक्षण अर्थात् वायु जब तक रहती है, तब तक उसमें स्पर्शगुण ) है। इंडेके 'योधातसे' मेरोसे जो शब्द निकलता है भी रहता है। किन्तु शब्द सा नहीं है । यायु रहते हुए | उसका यह शब्दसन्तान वायु ही लक्षण है। आकाश. भो शब्द नष्ट हो जाता है धायुके विशेष गुण स्पर्शके तृणतुलादि विधृत अवस्थामै यमान रहता है, यह साथ ऐसो विलक्षणता रहनेफे कारण शब्दं वायुका भी यायुके अस्तित्वका परिचायक है। यही धृतिका उदा. विशेष गुण नहीं है। शब्दं यदि वायुका विशेष गुण | हरण है। इस प्रकार घायुको मस्तित्य सम्बन्ध होता, तो स्पर्शकी सरह पद भी यायद् द्रव्यमावो हो । कम्प भी एक लक्षण है। घायुफे सम्बन्धौ पैशेषिक- सकता था। . . . . . दर्शनके द्वितीय अध्यायके प्रथम माहिकमें पटुत गहरी परमाणुरूप घायु नित्य है, यह पहले लिखा ना चुका भालोचनों को गई है। है। भएयुक्त मामाफे सयोगसे पहले पवनपरमाणुमें सौख्यदर्शन के मतसे शब्दतम्मान और स्पर्शतन्माल. फर्मको उत्पत्ति होती है। सभी पवनपरमाणुफे परस्पर से घायुको उत्पत्ति हुई है, इस कारण घायुफे दो गुण सयोगसे दाणुकादिक्रममें महान्यायु उत्पन्न होती हैं। हैं,-शाद, भोर स्पर्श । जो जिससे उत्पन्न होता है, यह सपा. सानपरत कम्पमान हो कर आकाश अपस्थित उसका गुण पाता है तथा उसमें भो एक विशेष गुण रहती है। नियंगगमन यायुको समाय है । उस समय रहता है। पायुका विशेष गुण स्पर्श है तथा शम्दतग्मान- • ऐसे दूसरे किसी भी दम्पको उत्पत्ति नहीं होती जिससे से हुआ है, इस कारण शब्द और घायुका गुण जानना पायुका धेग प्रतिहत हो सके। वायुको टिक पोछे उसो प्रकार माप्य पाजलीय परमाणमें कर्मति होगा!: सांख्यकारिकाके माध्यमें गौड़पादने लिखा- हो कराणुकादिकममें महान् सलिलराशि उत्पन्न होती । "शब्दवन्मात्रादाकार वायु: रूपतन्मापाचनः तथा वायुवेगसे कम्पमान हो कर पायुमें अयस्थित रहती 1. रसजन्माप्रादापः गन्धतन्मात्रात् पृयिती एव परम्पः परमागुम्मा - है। (न्यायद० ) घेषिकदर्शनकार कहते हैं-"- पञ्चमहामता न्युत्पद्यन्ते !" . पान यायुः" ) . . किन्तु पाचस्पतिमित्र कहते हैं- ... ... . Vol. XXI. 37." '.