पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/२१४

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१८८ वायुविज्ञान दिनफे विपरीत रातको भूभागका वायुप्रयाद समुद्रको । इनफे द्वारा नष्ट हो जाता हैं। घेटइण्डिज दोपौ पर और दौड़ता है। इन दोनों वायुप्रयाहाँका नाम 'समुद्र । वायु एफ बार ऐसा भयङ्कर हो उठी पो, कि उसके यायु' और भूमियायु है। समुद्रतटफे सिवा अन्यत्र स्मरणमात्रसे शरीर रोमाञ्चित हो जाता है। कभी मां यायुका यह प्रयाह अनुभून नहीं होता। नगरों पर होतो हुई यह पाय जय प्रयादित होती थी स्थूल पदार्थोपरि थाहत लोट्रको तरह घायु भो । तंव मकानोंको ईटे उमाई कर फेक देती थी। एक प्रत्यावर्तनशील है, इसी कारण घायुप्रयाह पर्वत या | सौहायसे मधिक चौड़ा और कई फोस लमा एक किमी प्राचीन आदिसे शाहत होने पर यहांसे प्रत्या- वरमै निम्माण कर दिया था । सुना जाता tir पर्तन कर पहले जिस दिशासे प्रवाहित हुआ था, उससे ) घूर्णितवायु द्वारा कई पोखरे और तलायोंक पार्टीको ठोक दूसरी गोरको मला जाता है। विपरीतकी ओर इस ईटें भी उखड़ जाती हैं। यमुण्डाद्वीपस्थ दुर्गको यन. तरह दो वायुप्रथादोंफे परस्पर आदत होने पर वयएडर या भूमिसे कई बार इस घायुकं प्रभायसे प्रकाण्ड-प्रकार घर्णितयाय उत्पन्न होती है। सिधा इसके कोई एक मिथा इसके कोई एक तो भो उड़ गई घो। स्थान हठात् चायुशन्य हो जाने पर उस स्थानको पूर्ति एक वार कलकत्ते के निकट 'धापा' नामक स्थानसे करने लिपे चारो मोरसे जोरोंसे यायुका आगमन होता ) यह घायु उत्थित हुई यो । यद येलियाघाटा होता है इसलिये भो धूर्णितया उत्पन्न होती है। पूर्णित- हुई कलकत्त से दक्षिण येनिया पासा कोई गाठ कोस तक घायुको उत्पत्ति भाकाशमण्डल में विद्युत् सम्पीय मन्य | गई थी। चौड़ाई में प्राया आध पाप कोस थी। इसमें फिसो नैसर्गिक कारणसे भी हो सकती है । चूर्णितयाय / उसको घा, धार, पक्ष जो कुछ मिले, उसने सबका अलपरिसरयिशिए होने पर "धूलिध्वज" या यषणहरके मूलाच्छ ६ कर दिया था। इसी पायस निसिप. नामसे विण्यात होता है, यह भूतको प्याफे नामसे | साहबफे मकानसे २० मनसे भारी लाइफ टुक उड़ भी प्रसिद्ध है। इस चाय की धूलिराशिमें कमी कभी गपे थे। ईटफे पने स्तम्म हट कर दूर पर जा गिरे थे। पत्ते आदि स्तम्माकाग्म परिणत हो जाते हैं। पञ्जाव | अधिक दिनको धात नहीं स्यों शताग्दोसे अन्तिम प्रदेश में प्रीष्मकाल में नित्य ही ययण्डर भादि धूल झमाह | भागमें बङ्गालमै ऐसो दो घूणित यायु प्रयादित दुई थीं। दिखाई दिया करते हैं। उत्तर-पश्चिमभारतमें कई जगह पदले मेघना नदीफे गर्मसे उठ कर दाका नगर प्रसित प्रोमकालमें लू चलनो है। } नवादफे घरका उठा फर समुद्गर्भमै हुवा दिया था। यह चूर्णितपाय मते घूमते भी ऊपर कमी नीचे | पश्चिम बङ्गालो एण्डिया रेलपथके नलहटी स्टेशन भाया करता है। इसके चूर्णितमण्डलको परिधिका परिसर निकट एक गुइम ट्रेन रस पायुसे उद कर रेल लाइन अधिक होनेसे प्रायःदी पक स्थान में मप्रगमन हुमा करता से बहुत दूर पर जा गिरी थी। गौर कमी कभी इसके द्वारा यिस्मयजनक घटना भी इस वायु का मण्डल यदि सैकड़ो कोसका होता है, हो सकता है। एक बार एक छोटे वयण्डरने एक घोयो- तो उसे आंधो कहा करते हैं। मांधी चा किमो तरह फे पसारे हुए कितने कपोंको फई महम हाथ दूर पर की पयों न हो, पद पूर्णित पाय या ययण्टर दी है। फेक दिया। लण्डनमें एक बार धोबीने कुछ कपड़ा गांधी सदा हो यहती रहती है।मफे सामने जो सीत सुमानिके लिपे पसारा था, २फ छोटे बयण्टरने भीषण पडती है, उसको गति मा उसीकी तरह दी जाती है। येगसे इन कपड़ों को ले जा कर गिरजेफे शिषर पर छोड़ पूर्णनका मण्डल छोटा और बड़ा मा दो सकता है। दिया। किन्तु सबको स्थूरगति प्रायः पक हो त । सामान्यतः स धाय का घेग मत्यरत प्रयास नहीं होता। इसीसे इसको पातायर्रा कही है। सांधो सि.ओर है। गितु मी समता उतना सामाग्य नहीं है। चाहे ना मदीं सकती। नन्द सूटको गति जिस प्रकार गोरि. हम पाते हैं, कि दही यदी मालिका मी/ स्थिर नियममं होती है धो भी इसी सदर