पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/२१५

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वायुविज्ञान १८६ मस्वण्टनीय नियमके अधीन है। निरक्षात्तके उत्तरकी आधी माया करती है। चीनसमुदमें इसका यह प्यास समी मांधियां पूर्वासे उत्तर और पश्चिम हो कर सङ्कीर्ण हो कर एक सौ या डेढ सौ कोसका हो घूमती घूमती उत्तरको और मप्रसर होती है और निरक्ष | जाता है। पृत्तके दक्षिण जो माँधियां उठती है, यह पश्चिमसे यातावर्तकी गतिके विषयमें कोई स्थिरता नहीं। उत्तर और पूर्ण हो कर घूमती-घूमती दक्षिणकी ओर प्रति घण्टा ७से ५० ज्योतिषी फास तक तूफान भ्रमण प्रस्थान करती है। इस तरह कितनी बांधियां भागे | कर सकता है। चल कर मण्डलाकार में परिणत हो जाती है। किन्तु तूफानफे भूभाग पर प्रवाहित होनेसे पर्यंत, पृक्ष, अब तक जो गांधियां दीख पड़ी है उनमें कोई भी दूसरोह मकान, चहारदीवारीसे रुक जाने के कारण इसको गति , तरहसे आई नदी देखो गई। . . धीमी पड़ जाती है। - घायुगतिका ज्ञान मल्लाहों को बड़ा काम देता है। समुद्री घेसी कोई बाधा न रहनेसे आंधी बहुत दूर पयोंकि इसके द्वारा यह अनायास ही बांधो तूफानसे तक भ्रमण किया करती और वहां अपने धर्म तथा लक्षण. भाग जहाज और , अपना प्राण बचाते। का प्रचार किया करती है। इसी कारण मलाद समुद्र में । कितने ही इसी विद्या बलसं शांधोमै आत्मरक्षा तुफानके धर्म निरूपण करने में जैसा अवसर पाते है स्थल- फरते हुए वह दिनसाध्य पथको घोड़े ही दिनमें तय | के लोग वैसी सुविधा नहीं पाते । रेफिल्ड, रोड़, विहि कर लेते हैं। एक बार पहाज थोपरीपान जगना रन भीर मरे मादि यूरोपीयगण विशेष यस्नसे याता. यात्रियोंको ले कर घोपसागरसे जा रहा था। कप्तान- वर्शके धर्म निरूपणमें एत कार्य हुए थे। • को सावधानीसे गांधी या तूफान में पड़ गया। मला ___ समुद्र के जिस स्थानसे यातायर्स प्रयादित होता है, जहाजको बचानेय लिये यात्रियों को समग में डाल देने उस जगहको जलराशिम असा धोका जोर रहता है, पर दाध्य हुए थे। सन् १६०२ ई०म इसी तरह एक जहाज उस हिसाबसे कभी कमी २०१२५।५० हाथ तक ऊंचो जापानी यानियाँको ले कर कलकत्तेसे रंगूनको मोर जो लहर उठती हैं। फमो कमो तो इसके दुगुनी तोगुनी रहा था। पडोपसागरको पार करते न करते अचानक अंची तरंगे उठा करतो। इन उठी हुई तरंगोंको दम उसको तूफानका सामना करना पड़ा । फलतः यह चाहं, तो पाताच किलोल कह सकते हैं। जहाजक दक्षिण-समुद्र में साड़ित दो फर भारतमहासागरके माता- लिये यह बहुत हानिकारक है। गास्कर छीपक निकट जा पहुंचा था। सफे चारों ओर तो तरङ्गायित जलका मोत उत्पन्न रथचक्राके घूमने के समय उसको परिधिका घेग नाभि | होता है उसको यातायस्रोत कहते हैं। जलफे इस देशकी अपेक्षा अधिक होगका अनुमान होता है। किन्ता स्यमाघसे परिचित रहना प्रत्येक मलाइका काम है। पार के पूर्णन समय ठीक उसका विपरीत फल प्रत्यक्ष पृथ्योके सभी हिस्समि वातायत हुमा करता है। किया जाता है। तूफान या मांधा. मएडलकी परिधि किन्तु यहोपसागर, मरीच होपके निकटफे भारतसमुद्र, जिस पैगस धूमती है, उसय मध्यमागमे उसको। चीनसमुद्र आदिम इसका जैसा प्रकोप देखा जाता अपेक्षा गुरतर धेग मालूम होता है। इसीलिये आंघो पैसा और कहीं दिखाई नहीं देता। इसी कारण उक्त समय जहां उसका मध्यभाग उपस्थित होता है, यहां कई स्थानोंको भूगोलफे जानकार पातायत मण्डल भयर उपद्य मच जाता है। कहते हैं। यातायर्सका याम सब जगह एक समान नहीं पातायत समप मुदतु मेघगर्जन, पियत: रहता। पेट (एमा प्रदेश ७८ सा कभी को दश विकास और प्रचुर पारियप होता है। इससे मालूम मौ कोस सक. यापमान हो पर यह मांघो प्रयादित हुई. होता है, कि यिपु स्पं साथ यातायतका कुछ न कुछ है। भारतसमुद्र में ४५ सौ कोसीम स्याप्त दरसाद सम्बन्ध है। . . . Vol. IXI, 48