पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/२५०

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२१४ वाक्ष्य-चाता पासनाके लिये जाता है, नहीं जानेसे क्रिया लोप हो । वाज.( स० पु०) पहा, कमल । - . . . . . .: मायगी।' अप्सराने हंस कर कहा, 'इतने दिनों के बाद | पार्ड ( पु) १ रक्षा, हिफाजत । २ किसी विiिe तुम्हारा धर्मकिया करनेका समय आया। इतने दिन जो कार्यके लिये घेर कर बनाया हुमा स्थान। ३ अस्पताल : बीत गये, पयों नहीं सन्ध्योपासना को ?' मुनिने उत्तर | या जेल आदिके अन्दरके पृथक पृथक विभाग। ४ नगर. ... दिया, 'या ! तुम तो सबेरे इस नदी के किनारे आई। में उनके महल्ले आदिको समूह जो किसी विशिष्ट । हो और पाछे मेरे गाश्रममें घुसी हो। गभी सन्ध्या- | कार्यके लिये अलग नियत किया गया हो।... । काल उपस्थित है। इसमें उपहासकी क्या बात है ?' | वार्डर ( स० पु०) १ वह जो रक्षा करता हो, रक्षा। अप्सरा घोली, मैं यहां सयेरे आई हूं सही, पर समय २ जेल आदिके अन्दरका पहरेदार। . . यहुत धीन गया। कितने वर्ष चले गये।' मुनिने पहुत | वार्णक (स० पु०) लेखक । . . . ध्याकुल हो कर पूछा, 'तुम्हारे साथ मैंने कितने दिनों वाणषय (सं० पु०) धर्णकको गोलज। - .. तक रमण किया। ' अप्सराने कहा, 'नौ सौ सात वर्ष छा | वार्णय (सं० वि०) घणुनदो-सम्भव, वर्ण नदीसे मास तीन दिन। उत्पन्न । ___ अप्सराके मुरसे यह सच्चो वात सुन कर मुनिको वार्णवक (सं० वि०) वार्णव स्वार्थ फन् । वर्गु नदो.. '. बहुत भात्मग्लानि हुई । मुनि अपनी आत्माको बार बार | सम्भव । धिकारने हुए बोले, 'हाय ! मेरो तपस्या नष्ट हो चुकी, वार्णिक (सं० त्रि०) वर्णलेखनं शोलमस्य वर्ण-उम्। बुद्धि मारी गई, मैं स्त्रोके साथ नीच दशामें पहुंच गया। लेखक । इस प्रकार मुनि बहुत समय तक अात्मनिन्दा करने लगे। यार्स (सं० त्रि.) त्तिरस्त्यस्येति (प्रशानदार्चा दृचिम्पो : स्त्रोफे प्रेममें फस कर कर्तव्यपथसे भ्रष्ट हो गये, यह णः। पा५।२।१०१) इति ण । १ निरामय, मारोग्य } सोच कर उन्हें घड़ी चिन्ता हुई और आखिर उस २ वृत्तिशाली, कामकाजी । (लो० ) ३ असार । अप्सराको विदा किया। अप्सरा कांप रही थी, मुनिके पातक (सं० पु०) पक्षिविशेष, वटेर। इसके मांसका भी क्रोधका पारावार न था, पर मुनिने उसे शाप नहीं गुण-अग्निवर्धक, शीतल, ज्वर और वियोपनाशक, दिया। उन्होने अपनो अयाध्य इन्द्रियका दी दोप दिया, रोचक, शुक्र तथा बलवर्धक । २ वार्ताको, भंटा।' .. था। वार्शन (सं०नि० ) वर्तनोभव। . ..:: ____जो हो, अप्सरा चली गई, किन्तु मुनिफे भय से उसके पार्रान्तबोय (सं० पु० ) १ परतन्तु-सम्बन्धीय । २ घेइको ... शरीरसे बेशुमार पसोना आने लंगा। जव यह शून्य एक शाखा । मार्गसे जा रही थी, तब एक चे वृक्षके तरुणपल्लयौ | यार्समानिक ( सं० लि. ) वर्तमान सम्बन्धीय। उसने अपना पसीना पोछ लिया। ऐसा करनेसे मुनिके । वार्ता ( स० स्त्री० ) पृत्तिरस्या अस्तीति ( प्रशानद्धार्ना . तेजसे जो उसे गर्भ रह गया था, पर गर्म लोमकूप हो कर वृत्तिम्यो यः । पा ५।२१०१ ) इति ण ततया । १ भगवती, स्वेद-जलाफारमें निकल गया। पीछे असराके स्वेदसे | दुर्गा। .देवीभगयतो घर्तन तथा धारण करतो है, इस सिक्ता हो यहां के सभी पक्षों ने गर्भ धारण किया। इसी | कारण उनका वार्ता नाम पहा है। २ पृत्ति, जोयिका। गर्भसे मारिपा नामक नारीरनकी उत्पत्ति हुई। ३ जनभूति, अफवाह । ४ वृत्तान्त, संपाद । ५ यिपया । वृक्षों ने यह नारीरन दे कर प्रचेताओं का क्रोध शान्त मामला ! ६ कथोपकथन, धातचीत । ७ पैश्यत्ति जिस . किया था। (विष्णु पु०) के अन्तर्गत कृषि, वाणिज्य, गोरक्षा गोर कुसीद है। पाय (सं० लि.) १ वृक्षसम्बन्धीय (को) । पृति, घेरा।। वैश्यको धार्ता द्वारा जीयिका निर्वाह करगी चाहिये। . धार्च ( स० पु.) यारि चरतोति छ । इंस। ८ ससारका आध्यात्मिक संवाद । घालीय (सं०नि०) वर्चल सम्बन्धीय। . पकरूपी धर्मने जब वातक सम्बन्धमें प्रश्न किया,